Thursday, April 18, 2013

कड़वा सच्च..ढोंगी बाबा....-(सुरेंदर पाल वाधवान )




नेताओं -अभिनेताओं के बिना अधूरे हैं आज  के सत्संग

कुछ संतों को है मीडिया का अच्छा खासा चस्का
समागमों पर किए जाते हैं लाखों खर्च,अभिनेता करते हैं गुणगान
सुरेंद्र पाल वधावन (शाहाबाद मारकंडा)
आजकल किसी संत महापुरुष के सत्संग या समारोह का आयोजन हो और उसमें किसी नेता -अभिनेता का आगमन न हो तो समझो सत्संग अधूरा है। नेताओं का सानिध्य पाने वाले इन संतों को नेताओं की तरह ही मीडिया में बने रहने का अच्छा खासा चस्का भी है। कार्यकम को लाईव दिखाने पर ही मोटा रुपया किसी चैनल को दिया जाता है। कुछ एक महापुरुष तो नेताओं के अलावा  फिल्मी हस्तियों को भी अपने समागम में बुलाकर अक्सर अपनी बल्ले-बल्ले करवाते रहते हैं।लोकप्रिय धारावाहिकों  के कई अभिनेता  भी सत्संग कार्यक्रमों में संत-गुणगान करते दिखाई दे जाते हैं।

 वास्तव में समय के बदलाव के साथ-साथ और आधुनिक तकनीक और जीवनशैली ने संत समाज के स्वरुप को बदल दिया है। आज के ज्यादातर संत सादगी से दूर हो रहे हैं और  पूर्णतया भौतिकवादी संस्कृति को आत्मसात कर चुके हैं। यह संत देश विदेश में समागम करते हैं जिन पर श्रद्धालुओं के लाखों रुपए खर्च होते हैं। इसके अलावा स्वंय को प्रचारित करने लिए उक्त श्रेणी के धनाढय संत महंगे  टी.वी चेनलों का सहारा लेते है। आमजन को अंत:मुखी बनने का उपदेश देने वाले यह संत स्वंय भौतिकवाद का बुरी तरह से शिकार हैं।
 किसी भी नगर में प्रवचन कार्यक्रम रखने से पहले संतों के बड़े बड़े कटाउट उसकी प्रमुख सडक़ों और स्थानों पर लगाए जाते हैं। पत्रकार सम्मेलन बुला कर पत्रकारों  से कवरेज की बात की जाती है और एवज में सत्संग के दौरान उन्हे सम्मानित किया जाता है। आयोजकों द्वारा  स्वागत द्वार सजाए जाते हैं और सडक़ों पर बिजली की लडिय़ां और फानूस लगाए-जगाए जातें हैं। बिजली की सप्लाई निर्विघ्र रखने के लिए जनरेटर उपलब्ध किए जाते हैं। जो लोग समागम में नहीं आते उन्हें संत जी की वाणी श्रवण कराने के लिए आयोजकगण हाई वॉटेज के स्पीकरों का इस्तेमाल करते हैं।  संतो के ठहरने की व्यवस्था आजकल किसी $गरीब की झोंपड़ी में नहीं होती और न ही संत कभी-भिक्षाम देह शब्द का उच्चारण करते भिक्षा मांगते हैं। संतो को भोज देने के लिए अमीर श्रद्वालुओं की कतार लगी रहती है। पंद्रह प्रकार के व्यंजन तैयार किए जाते हैं। समारोह स्थल के बाहर आर्युवेदिक दवाओं धार्मिक पुस्तकों चित्रों के स्टाल आकर्षण का केंद्र होते हैं। इन स्टालों पर पौरुष शक्ति बढ़़ाने की मूल्यवान दवाएं भी उपलब्घ रहती हैं। समागम में पंडाल के भरने की सूचना मोबाइल पर संत जी के प्रमुख चेले को मिलती है तो संतजी को एक लग्जरी वाहन में  प्रवचन स्थल पर लाया जाता है।











                                                           सुरेंदर  पाल वाधवान
                                                                9416872577

Wednesday, April 17, 2013

ग्रीन हाउस लगाकर प्रगति की राह पकड़ चूका है धर्म बीर मिर्जापुर|



छोटी जोत के किसानों में बढ़ रहा है अधिक आय लेने का रूझान।
जागरुक किसान बाजार भाव और लोगों की मांग को ध्यान में रखकर कर रहे हैं सब्जियों की खेती।
ग्रीन हाउस लगाकर प्रगति की राह पकड़ चूका है धर्म बीर मिर्जापुर|
कुरुक्षेत्र/ पवन सोंटी
देहात में एक कहावत प्रचलित हैं कि यदि पेट को ठीक रखना हैं तो खेत को ठीक रखना होगा। अतीत में कही गई यह कहावत आज भी पूरी तरह से तर्कसंगत हैं। पुराने जमाने में किसान रासायनिक खादों का बहुत कम यानि ना के बराबर प्रयोग करते थे। 
जैसे-जैसे समय बीतता गया बड़ी-बड़ी क पनियों ने किसानों को लुभावने नारे देकर उनका रुझान बेशक प्रति एकड़ उत्पादन में बढ़ोतरी की ओर कर दिया। किसानो ने अपनी मेहनत के चलते प्रति एकड़ खाद्यान उत्पादन में वृद्धि तो अवश्य की लेकिन असंतुलित रासायनिक खादों के प्रयोग के चलते जमीन की उर्वरा ताकत प्रभावित हुई, जिसका लोगों के यहां तक की पशुओं के स्वास्थ्य पर भी विपरित असर पर पड़ा।
                   सरकार के संस्थानों में कार्यरत वैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में चिंता जाहिर करते हुए किसानों का रूख जैविक यानि ऑर्गेनिक खेती की ओर मोडऩा शुरु कर दिया। इसी बीच जनसं या बढऩे और जमीन के बंटवारें के चलते छोटी जोत के किसानों ने फसलों के विविधिकरण में भलाई की बात समझकर जैविक तरीके से खेती करना शुरु कर दिया। ऐसे किसानों, विशेषकर युवा किसानों में कम जमीन में अधिक उत्पादन लेने की बजाए अधिक आय लेने की ललक दिखने लगी। पिछले कुछ वर्षो में यदि देखा जाए तो सरकार की किसान हितैषी नीतियों कृषि और बागवानी मिशन के चलते प्रदेश के किसानों ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई हैं। ऐसे ही किसानों में जिला  कुरुक्षेत्र के गांव मिर्जापुर के किसान धर्मवीर सिंह का नाम भी गर्व के साथ लिया जा सकता हैं। एम.ए. पास पढ़े-लिखे किसान ने बेरोजगारी से जुझते हुए अपने ही खेत में कुछ अलग करने की ठानी और प्रदेश का बागवानी मिशन किसान के कार्य में मार्गदर्शक बना। 

                   किसान ने बागवानी विभाग की सहायता से जुलाई वर्ष 2012 में अपने खेत में 560 स्केयर मीटर में पॉली हाउस बनवाकर चार पती यानि लगभग 6 इंच ल बी ब बी और ओरविला नामक शिमला मिर्च की किस्मों की पौध लगाकर खेती शुरु की और लगभग 70 दिन बाद फसल में फल लगना शुरु हो गया। लगभग 90 दिन बाद फसल रंग लेने लगी। पोली हाऊस बनवाने मेेंं कुल खर्चा 4 लाख 75 हजार रुपए खर्चा हुआ। किसान को 50 प्रतिशत अनुदान मिला। किसान ने  2 लाख 37 हजार 500 रुपए  किसान भागीदारी के रुप में दिए। फसल में जैविक खाद का प्रयोग किया गया। 560 स्केयर मीटर में क्षेत्र में लगभग 40 क्ंिवटल मिर्च की पैदावार हुई, जो 45 से 60 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकी। इस प्रकार लगभग एक लाख 60 हजार रुपये की फसल बिकी, जिसमे खर्चा निकाल कर किसान को लगभग 70 से 80 हजार रुपये का शुद्ध लाभ हुआ।
                   किसान बताता है कि अच्छी फसल लेने के लिए पौधे से पौधे की दूरी 40 सैंटीमीटर तक होनी चाहिए तथा फसल में पानी की मात्रा और समय का भी ध्यान र ाने की जरूरत हैं। जुलाई में पौध लगाने उपरान्त सित बर के अंत तक फसल तैयार होने लगती है और अप्रैल के अंत या फिर मई के शुरू तक मिर्चों की फसल का उत्पादन मिलता रहता है। इस प्रकार शिमला मिर्च का सीज़न लगभग साढे 8 महीने तक चलता है। जहां तक फसल में पानी देने की बात है, किसान बताता है कि 560 स्केयर मीटर में लगाई गई शिमला मिर्च की खेती के लिए सर्दियों में दूसरे या फिर तीसरे दिन एक हजार लीटर पानी देना पड़ता है और यदि मौसम गर्मी का हो, तो इतना ही पानी प्रतिदिन देने की आवश्यकता है। वैसे एक एकड़ की शिमला मिर्च की फसल में सर्दियों में लगभग 6 हजार लीटर पानी दूसरे या तीसरे दिन देने की आवश्यकता है, जबकि गर्मियों में प्रतिदिन लगभग 6 हजार लीटर पानी देना पड़ता है। किसान ने 560 स्केयर मीटर में शिमला मिर्च की पौध के 1500 पौधे लगाए और यदि एक एकड़ में पौली हाऊस बनाकर शिमला मिर्च की खेती की जाए, तो लगभग 12 हजार पौधे लगाने की आवश्यकता पड़ती है। 

                   घरौंडा के सब्जी इंडो-इजराईल उत्कृष्ठा केन्द्र में आयोजित मेले में किसान धर्मवीर को प्रदेश के कृषि मंत्री परमवीर सिंह और बागवानी विभाग के निदेशक सत्यवीर सिंह ने फरवरी 2013 में राज्य स्तरीय पुरस्कार से स मानित किया। यह स मान पाने के उपरान्त किसान ने 4 हजार स्केयर मीटर में शिमला मिर्चों की खेती का मन बना लिया हैं। किसान शीघ्र ही अपने खेत में  पॉली हाउस बनवाकर विभिन्न किस्मों की मिर्चों की खेती के साथ-साथ टमाटर और बिना बीज के खीरे की खेती भी शुरु करने जा रहा है। चार हजार स्केयर मीटर में पोली हाऊस बनवाने में  लगभग 36 लाख रुपए की धनराशि खर्च होगी। इसमें से 65 प्रतिशत अनुदान के चलते किसान को लगभग 13 लाख रुपए हिस्सेदारी के रुप में देने होंगें।
                   इस संदर्भ मेंं जब किसान के खेत में बने पॉली हाउस में उससे बात की गई, तो उन्होनें पॉली हाउस में उगाई गई शिमला मिर्च की फसल दि ााते हुए बताया कि खुले में उगाई गई फसल की पैदावार पॉली हाउस में उगाई गई फसल की अपेक्षा कम होती हैं। पॉली हाउस में फसल का उत्पादन 4 से 5 गुणा अधिक बढ़ जाता हैं। बातचीत के दौरान किसान ने बताया कि यदि फसल अच्छी लग जाएं और बाजार में मांग बढ़ जाए, तो शिमला मिर्च 100 रुपए किलो तक बिक जाती हैं। खेत में पीले और लाल रंग की मिर्च दिखाते हुए किसान बताता हैं कि इस प्रकार की मिर्च अकसर बड़े-बड़े होटलों में सलाद के तौर पर खाई जाती हैं। आम बाजार में इनका भाव 40 से 60 रुपए प्रति किलोग्राम रहता हैं। मिर्च का वजन 50 से 200 ग्राम तक हो जाता हैं।
                   जिला में फसलो के विविधिकरण के चलते गांव ठोल के किसान मंदीप ने भी अपने खेत में नेटाजेट मशीन स्थापित करके लगभग 2 एकड़ में शिमला मिर्च की फसल लेने के लिए पौध की रुपाई की हैं। मशीन के प्रयोग से ड्रिप के माध्यम से 90 प्रतिशत पानी की बचत रहती हैं। किसान मंदीप बताता हैं कि उसने एक एकड़ में बैड बनाकर लगभग 13000 पौधे लगाए हैं। किसान का फसलों के विविधिकरण को बढ़ाते हुए बेमौसमी सब्जियां लगाने के लिए नैट लगाने का कार्यक्रम हैं। किसान के अनुसार वह बैंगन और करेले की फसल की खेती भी करता है। बदलते परिवेश में जैविक पद्धति से तैयार फसलों की मांग बढऩे लगी हैं। इसलिए फसलों के विविधिकरण में किसानों का रूझान भी अधिक आय लेने की ललक में करवटें बदलने लगा। बागवानी के क्षेत्र में हरियाणा सरकार का बागवानी मिशन किसानों, विशेषकर छोटी जोत के किसानों के लिए आर्थिक क्षेत्र में नये अध्यायों का सूत्रपात करने वाला सिद्ध हो रहा है।
                   उपायुक्त मंदीप बराड़ का कहना है कि कुरुक्षेत्र में जमीन की तासीर फसलों को बेहतर गुणवत्ता देने के साथ-साथ सब्जी उत्पादन के लिए भी बेहतर मानी जाती है। यही कारण है कि जो किसान गेहूं व धान की खेती करते हैं, वे सब्जियों, फलों, फूलों, यहां तक की खूंबी इत्यादि की खेती भी करते हैं। जिला के कई किसानों ने सब्जी उत्पादन के क्षेत्र के साथ-साथ फसलों के विविधिकरण में अच्छा नाम कमाया है। कई किसानों ने न केवन प्रदेश में, बल्कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है। इस क्षेत्र में सरकार की कृषि और किसान हितैषी स्कीमें और योजनाएं भी किसानों का मार्गदर्शन बनकर उमड़ी है। कहना न होगा कि बदलते परिवेश में निकट भविष्य में यहां के किसान फसलों के विविधिकरण में और बेहतर नाम कमाएंगे।

Monday, April 15, 2013

राजस्थान के लोक संस्कृति पर विशेष लेख ...बेला गर्ग ,,,,हिम्मत व हौंसले की जीती मिसाल है मोहनलाल .....वधावन





गणगौर है स्त्रीत्व का उत्सव


- बेला गर्ग-

गणगौर राजस्थान लोक-संस्कृति से जुड़ा वह उत्सव है, जो नारी-जीवन की तमाम इच्छाओं को सुख की कामनाओं से जोड़कर अभिव्यक्त करता है। यह नारी उल्लास का पर्व है और नारी असितत्व एवं असिमता की अक्षुण्णता इसका हार्द है।

सोलह दिन तक उल्लास और उमंग के साथ चलने वाला यह पारम्परिक पर्व सही मायने में स्त्रीत्व का उत्सव है। एक महिला के ह्रदय के हर भाव को खुलकर कहने, खुलकर जीने का उत्सव। विवाह के बाद पहली गणगौर मनाने के लिए ब्याही बेटियों का पीहर आना और सब कुछ भूलकर फिर से अपनी सखियों संग उल्लास में खो जाना रिश्तों को नया जीवन दे जाता है। गणगौर भारतीय गृहस्थ जीवन का महाकाव्य है। यह लोक-उत्सव जनमानस को अपने सुख में डुबोकर पुन: ताजगी से भर देता है। इस पर्व में महिलाएं एवं युवतियां बहुविध प्रयत्नों से अपने जीवन को संवारने के लिये प्रतिबद्ध होती है, वे गाती है, मनौतियां मांगती है, उत्सवमयता को संजोती है, अच्छे वर की कामना करती है, जो विवाहित या नवविवाहित हैं वे अच्छे जीवन के सपनों के बीज बोती है, यह सब करते हुए वे समूचे परिवेश को पवित्र कर देती है। यह पर्व जीवन को उल्लास एवं खुशी से रोमांचित कर देता है। 

कोयल जब बसंत के आगमन की सूचना देने लगती है। खेतों में गेहूं पकने लगता है। आम्र वृक्ष बौरों के गुच्छों की पगड़ी बांधते हैं। तब बसंत के उल्लासित मौसम में गणगौर का त्यौहार मनाया जाता है। गणगौर का त्यौहार नारी जीवन की शाश्वत गाथा बताता है। यह नारी जीवन की पूर्णता की कहानी है। यह त्यौहार अपनी परम्परा में एक बेटी का विवाह है। जिसमें मां अपनी बेटी को पाल-पोसकर बड़ा करती है। उसमें नारी का संपन्न और सुखी भविष्य देखती है- उसी तरह गणगौर पर्व में जवारों को रौपा जाता है और नौ दिन तक पाला-पोसा जाता है, सींचा जाता है। धुप और हवा से उनकी रक्षा की जाती है और एक दिन बेटी का ब्याह रचा दिया जाता है। गणगौर से जुडे़ लोकगीत भी मंत्रों की तरह गाये जाते हैं। पूजा के हर समय और हर परम्परा के लिए गीत बने हुए हैं, भावों की मिठास और मनुहार लिए।
शिव गौरी के दाम्पत्य की पूजा का पर्व गणगौर मानो प्रगति का उत्सव है। माटी की गणगौर बनती हैं और खेतों से दूब और जल भरे कलश लाकर उनकी पूजा की जाती है। मुझे यह एक अकेला ऐसा त्यौहार लगता है जब सब सखिया हिल-मिल हर्षित उल्लासित हो मां गौरी से सुखी और समृद्ध जीवन के लिए प्रार्थना की जाती हैं।
आज भले ही समय बहुत बदल गया है पर मैंने स्वयं इस त्यौहार को अपने गांव राजस्थान के शेखावटी अंचल के लक्ष्मणगढ़ में कुछ इस तरह मनाया है कि बहू-बेटियां पूरे हक से चाहे जिस खेत में जाकर दूब ला सकती थीं। कोर्इ रोक-टोक नहीं होती थी। गीत गातीं, नाचती और देर रात तक बिना किसी भय के गांव भर में घूमती थी। आज यह पर्व हम राजस्थानी महिलाएं पूरी आन-बान और शान के साथ पूरे रीति-रिवाज से दिल्ली महानगरीय जीवन में भी उसी गरिमा एवं परम्परा से मनाती है।
गणगौर का सन्देश यही है कि नारी अपनी सम्पूर्णता में ढलते हुए पवित्रता, स्नेह, सहयोग, ममत्व एवं ममत्व जैसी पवित्र भावना से अपने को अभिसिचिंत करे। ऐसे आचरण से ही नारी सौलह कला सम्पन्न एवं आदर्श चरित्र की नायक बनती है। तथाकथित आधुनिक एवं पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण के कारण इस पर्व की गरिमा भी धुंधला रही है। यही कारण है कि इस पर्व का आध्यातिमक एवं सांस्कृतिक महात्म्य भूलते जा रहे हैं, मर्यादाओं का दायरा सिकुड़ रहा है और नारी अपनी नारी-सुलभ गुणों को धुंधला रही है। जबकि पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते को सुदृढ़ बनाने, एक श्रेष्ठ पारिवारिक संरचना को गठित करने, मूल्यनिष्ठ समाज की स्थापना करने, पूरे विश्व को एकसूत्र में बांधने तथा समग्र नारी समाज को पवित्रता के संकल्प में बंधकर हर एक को इसकी पहल करने का अलौकिक सन्देश देता है गणगौर।
  हर युग में कुंआरी कन्याओं एवं नवविवाहिताओं का गहरा संबंध गणगौर पर्व से जुड़ा रहा है। आदर्श पारिवारिक एवं सामाजिक संरचना में इस पर्व की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और उसी से व्यवहार में शुचिता आती है। सातिवक भावनाएं एवं नारी सुलभ उच्च ऊर्जा से तन-मन आध्यातिमक शांति और आनन्द से सरोबार हो जाता है। जीवन निर्माण के संकल्पों से आबद्ध सभी बालिकाएं एवं महिलाएं सामूहिक भकित एवं सांस्कृतिकता की साधना के माध्यम से एक अनोखी सामाजिकता की भावना विकसित करती है। अपने असितत्व, परिवार में जीने और दाम्पत्य को सुखद बनाने की पहली शकित हर नारी गणगौर पर्व की पृष्ठभूमि से प्राप्त करती है। यधपि इसे सांस्कृतिक उत्सव के रूप में मान्यता प्राप्त है किन्तु जीवन मूल्यों की सुरक्षा एवं वैवाहिक जीवन की सुदृढ़ता में यह एक सार्थक प्रेरणा भी बना है।
गणगौर शब्द का गौरव अंतहीन पवित्र दाम्पत्य जीवन की खुशहाली से जुड़ा है। कुंआरी कन्याएं अच्छा पति पाने के लिए और नवविवाहिताएं अखंड सौभाग्य की कामना के लिए यह त्यौहार हर्षोल्लास के साथ मनाती हैं, व्रत करती हैं, सज-धज कर सोलह श्रींगार के साथ गणगौर की पूजा की शुरुआत करती है। पति और पत्नी के रिश्तें को यह फौलादी सी मजबूती देने वाला त्यौहार है, वहीं कुंआरी कन्याओं के लिए आदर्श वर की इच्छा पूरी करने का मनोकामना पर्व है। यह पर्व आदर्शों की ऊंची मीनार है, सांस्कृतिक परम्पराओं की अद्वितीय कड़ी है एवं रीति-रिवाजों का मान है।
गणगौर का त्यौहार होली के दूसरे दिन से ही आरंभ हो जाता है जो पूरे सोलह दिन तक लगातार चलता है। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से कुवांरी कन्याएं और नवविवाहिताएं प्रतिदिन गणगौर पूजती हैं, वे चैत्र शुक्ला द्वितीया (सिंजारे) के दिन किसी नदी, तालाब या सरोवर पर जाकर अपनी पूजी हुर्इ गणगौरों को पानी पिलाती हैं और दूसरे दिन सायंकाल के समय उनका विसर्जन कर देती हैं।
सोलह दिनों तक चलने वाले इस त्यौहार में होली की राख से सोलह पीणिडयां बनाकर पाटे पर स्थापित कर आस-पास ज्वारे बोए जाते हैं। र्इसर अर्थात शिव रूप में गण और गौर रूप में पार्वती को स्थापित कर उनकी पूजा की जाती है। मिटी से बने कलात्मक रंग-रंगीले र्इसर गण-गौर झुले में झुलाए जाते हैं। सायंकाल बींद-बींनणी बनकर बागों में या मोहल्लों में रंग-बिरंगे परिधान, आभूषणों में किशोरियां और नवविवाहिताएं आमोद-प्रमोद के साथ घूमर नृत्य करती हैं, आरतियां गाती हैं, गौर पूजन के गीत गाकर खुश होती हैं। जल, रोली, मौली, काजल, मेहंदी, बिंदी, फूल, पत्ते, दूध, पाठे, हाथों में लेकर वे कामना करती हैं कि हम भार्इ को लडडू देंगे, भार्इ हमें चुनरी देगा, हम गौर को चुनरी धारण करायेंगे, गौर हमें मनमाफिक सौभाग्य देगी।
नाचना और गाना तो इस त्यौहार का मुख्य अंग है ही। घरों के आंगन में, सालेड़ा आदि नाच की धूम मची रहती है। परदेश गए हुए इस त्यौहार पर घर लौट आते हैं। जो नहीं आते हैं उनकी बड़ी आतुरता से प्रतीक्षा की जाती है। आशा रहती है कि गणगौर की रात को जरूर आयेंगे। झुंझलाहट, आह्लाद और आशा भरी प्रतीक्षा की मीठी पीड़ा को व्यक्त करने का साधन नारी के पास केवल उनके गीत हैं। ये गीत उनकी मानसिक दशा के बोलते चित्र हैं।
गणगौर का पर्व दायित्वबोध की चेतना का संदेश हैं। इसमें नारी की अनगिनत जिम्मेदारियों के सूत्र गुमिफत होते हैं। यह पर्व उन चौराहों पर पहरा देता है जहां से जीवन आदर्शों के भटकाव की संभावनाएं हैं, यह उन आकांक्षाओं को थामता है जिनकी गति तो बहुत तेज होती है पर जो बिना उद्देश्य बेतहाशा दौड़ती है। यह पर्व नारी को शकितशाली और संस्कारी बनाने का अनूठा माध्यम है। वैयकितक स्वार्थों को एक ओर रखकर औरों को सुख बांटने और दु:ख बटोरने की मनोवृत्ति का संदेश है। गणगौर कोरा कुंआरी कन्याओं  या नवविवाहिताओं का ही त्यौहार ही नहीं है अपितु संपूर्ण मानवीय संवेदनाओं को प्रेम और एकता में बांधने का निष्ठासूत्र है। इसलिए गणगौर का मूल्य केवल नारी तक सीमित न होकर मानव मानव के मनों तक पहुंचे।

                        



(बेला गर्ग)
र्इ-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आर्इ. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोन: 22727486, 981105113 








मिसाल
हिम्मत व हौंसले की जीती मिसाल है मोहनलाल
100 फीसदी फिजीकली चैलेंजड पर स्वाबलंबी
शाहाबाद मारकंडा/सुरेंद्र पाल वधावन
दिल में अगर कुछ कर गु़ज़रने का जजबा हो तो इंसान बड़ी से बड़ी मुश्किल से भी पार उतर जाता है। ऐसा ही एक साक्षात् उदाहरण है यहां का मदनलाल जो पूरी तरह से विकलांग होने पर भी अपने लिए दो जून की रोजी का जुगाड़ कर लेता है । नगरवासी पूरा दिन एक 18 वर्षीय 100 प्रतिशत विकलांग मोहनलाल पुत्र कृष्णलाल को रोटरी क्लब शाहाबाद द्वारा 10-11-2012 को दी गई ट्राई साईकिल पर बाजारों में घूमते देखते हैं। यह नवयुवक जो इस समय निकटवर्ती अरूपनगर में रहता है 2008 में हुई एक रेल दुर्घटना में दोनों टांगे गंवा बैठा था। बी.पी.एल. है तथा सरकार द्वारा इसे विकलांग पैंशन 750 रूपए मासिक मिल रही है। 
पिता कृष्णलाल डा. नागपाल अस्पताल के निकट पूजा टेलर के नाम से दर्जी का कार्य करता है। एक मुलाकात में इस युवक ने कहा कि अपनी आजीविका के लिए तथा इस लक्ष्य से कि वह स्वावलंबी हो वह जो लोग उसे अपनी रसोई गैस की पर्ची कटवाने या फिर गोदाम से उसका गैस सिलेंडर लाने को कहते हैं या अन्य कार्य कहते हैं वह कर देता है और इससे प्रतिदिन लगभग 150 रूपए कमा लेता है।
 

हमें तो गाँव में अक्सर दरोगा लूट जाता है.....अनुज गोयल

ज़रा पाने के चाहत में , बहुत कुछ छूट जाता है....
ना जाने सब्र का धागा , कंहा पर टूट जाता है....
किसे हमराह कहते हो यंहा पर अपना साया भी....
कंही पर साथ चलता है .... कही पर छूट
जाता है..........
गनीमत है नगरवालो, लूटेरो से लुटे हो तुम,
हमें तो गाँव में अक्सर दरोगा लूट जाता है.....
अजब शै है ये रिश्ते भी बहुत मजबूत लगते है...
ज़रा से भूल से लेकिन भरोसा टूट जाता है.....
 
 
 
 
 
 
 
 
 
अनुज  गोयल , लाडवा (कुरुक्षेत्र)

Friday, April 12, 2013

ताज के बारे में कुछ जानकारी Aditya Chaudhary के वाल से ...जरूर पढ़ें......

Aditya Chaudhary shared Pratham Shukla's photo.
पढने से पहले इसे शेयर करे फिर आराम से पढ़े :- 

ताजमहल उर्फ़ तेजो महल से जुड़े कुछ और रहस्यमय बाते :- 

१) क्या आप जानते हैं ताजमहल के अंदर आज भी अनेक कक्ष रहस्यों को दबाये बंद पड़े हैं जिन्हें सरकार ने खुलवाने की जगह उनके दरवाजे हटा के पत्थरों से सील कर दिया .................

२) इन कमरों के अंदर क्या हैं ये आप निम्नलिखित शोधो से समझ जायेंगे || सरकार ने किस कदर इस सारे भेद से जनता को गुमराह किया हुआ हैं खुद देख लीजिये ...........

(क)१९५२ में जब एस.आर .राव पुरात्व अधिकारी थे तब उन्हें ताजमहल की एक दीवार में लम्बी चौड़ी दरार दिखाई दी . मरम्मत के दौरान आसपस की और ईंटे निकलवाने की जरुरत पड़ी , जब ईंटे निकाली गयी तो कक्ष में से अष्ट धातु की मूर्तियाँ दिखाई देने लगी . ....तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु को ज्ञात करवाने पर निर्णय लिया गया की मूर्तियाँ जहाँ से निकली हैं वो जगह ही बंद करवा दी जाए || 

आपने पिछली पोस्ट में भी "पी .एन.ओक" के द्वारा दिए गए १०८ सबुतो में पढा की :- 

"68. स्पष्तः मूल रूप से शाहज़हां के द्वारा चुनवाये गये इन दरवाजों को कई बार खुलवाया और फिर से चुनवाया गया है। सन् 1934 में दिल्ली के एक निवासी ने चुनवाये हुये दरवाजे के ऊपर पड़ी एक दरार से झाँक कर देखा था। उसके भीतर एक वृहत कक्ष (huge hall) और वहाँ के दृश्य को‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍ देख कर वह हक्का-बक्का रह गया तथा भयभीत सा हो गया। वहाँ बीचोबीच भगवान शिव का चित्र था जिसका सिर कटा हुआ था और उसके चारों ओर बहुत सारे मूर्तियों का जमावड़ा था। ऐसा भी हो सकता है कि वहाँ पर संस्कृत के शिलालेख भी हों। यह सुनिश्चित करने के लिये कि ताजमहल हिंदू चित्र, संस्कृत शिलालेख, धार्मिक लेख, सिक्के तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं जैसे कौन कौन से साक्ष्य छुपे हुये हैं उसके के सातों मंजिलों को खोल कर उसकी साफ सफाई करने की नितांत आवश्यकता है।"

"69. अध्ययन से पता चलता है कि इन बंद कमरों के साथ ही साथ ताज के चौड़ी दीवारों के बीच में भी हिंदू चित्रों, मूर्तियों आदि छिपे हुये हैं। सन् 1959 से 1962 के अंतराल में श्री एस.आर. राव, जब वे आगरा पुरातत्व विभाग के सुपरिन्टेन्डेंट हुआ करते थे, का ध्यान ताजमहल के मध्यवर्तीय अष्टकोणीय कक्ष के दीवार में एक चौड़ी दरार पर गया। उस दरार का पूरी तरह से अध्ययन करने के लिये जब दीवार की एक परत उखाड़ी गई तो संगमरमर की दो या तीन प्रतिमाएँ वहाँ से निकल कर गिर पड़ीं। इस बात को खामोशी के साथ छुपा दिया गया और प्रतिमाओं को फिर से वहीं दफ़न कर दिया गया जहाँ शाहज़हां के आदेश से पहले दफ़न की गई थीं। इस बात की पुष्टि अनेक अन्य स्रोतों से हो चुकी है। जिन दिनों मैंने ताज के पूर्ववर्ती काल के विषय में खोजकार्य आरंभ किया उन्हीं दिनों मुझे इस बात की जानकारी मिली थी जो कि अब तक एक भूला बिसरा रहस्य बन कर रह गया है। ताज के मंदिर होने के प्रमाण में इससे अच्छा साक्ष्य और क्या हो सकता है? उन देव प्रतिमाओं को जो शाहज़हां के द्वारा ताज को हथियाये जाने से पहले उसमें प्रतिष्ठित थे ताज की दीवारें और चुनवाये हुये कमरे आज भी छुपाये हुये हैं। "

और हमारे देश का दुर्भाग्य ये की सरकार ने इस सारे रहस्यों की छानबीन करने की जगह सभी भेदों को दबाने का ही प्रयास किया ...........
ऐसा क्यों किया होगा ?? इसका कारण तो आप भी जानते हैं ............

निष्कर्ष :- तो यही निकलता हैं की ताजमहल के अंदर बहुत रहस्य दबे पदे हैं जिससे हिन्दू जनता को परिचित होना आवश्यक हैं ..............सरकार ने हिन्दू जनता को सिर्फ धोखे में रखा हुआ हैं आज तक ....................................................

अंत में :- सिर्फ ताज ही नहीं अपितु क़ुतुब मीनार ,जामा मस्जिद , लाल किला जैसे कई स्थापित्य हिन्दू राजाओ की इस भव्य भारत को देन हैं | इतिहास को तोड़ मरोड़ के पेश किया गया हैं , पर हमारा फर्ज हैं की जो भी सच जानने पढने को हमे मिलता हैं उसे हम ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुचाये और अपनी अगली पीढ़ी को हिन्दू होने गर्व वापिस दिलाये ||
पढने से पहले इसे शेयर करे फिर आराम से पढ़े :-

ताजमहल उर्फ़ तेजो महल से जुड़े कुछ और रहस्यमय बाते :-

१) क्या आप जानते हैं ताजमहल के अंदर आज भी अनेक कक्ष रहस्यों को दबाये बंद पड़े हैं जिन्हें सरकार ने खुलवाने की जगह उनके दरवाजे हटा के पत्थरों से सील कर दिया .................

२) इन कमरों के अंदर क्या हैं ये आप निम्नलिखित शोधो से समझ जायेंगे || सरकार ने किस कदर इस सारे भेद से जनता को गुमराह किया हुआ हैं खुद देख लीजिये ...........

(क)१९५२ में जब एस.आर .राव पुरात्व अधिकारी थे तब उन्हें ताजमहल की एक दीवार में लम्बी चौड़ी दरार दिखाई दी . मरम्मत के दौरान आसपस की और ईंटे निकलवाने की जरुरत पड़ी , जब ईंटे निकाली गयी तो कक्ष में से अष्ट धातु की मूर्तियाँ दिखाई देने लगी . ....तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु को ज्ञात करवाने पर निर्णय लिया गया की मूर्तियाँ जहाँ से निकली हैं वो जगह ही बंद करवा दी जाए ||

आपने पिछली पोस्ट में भी "पी .एन.ओक" के द्वारा दिए गए १०८ सबुतो में पढा की :-

"68. स्पष्तः मूल रूप से शाहज़हां के द्वारा चुनवाये गये इन दरवाजों को कई बार खुलवाया और फिर से चुनवाया गया है। सन् 1934 में दिल्ली के एक निवासी ने चुनवाये हुये दरवाजे के ऊपर पड़ी एक दरार से झाँक कर देखा था। उसके भीतर एक वृहत कक्ष (huge hall) और वहाँ के दृश्य को‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍ देख कर वह हक्का-बक्का रह गया तथा भयभीत सा हो गया। वहाँ बीचोबीच भगवान शिव का चित्र था जिसका सिर कटा हुआ था और उसके चारों ओर बहुत सारे मूर्तियों का जमावड़ा था। ऐसा भी हो सकता है कि वहाँ पर संस्कृत के शिलालेख भी हों। यह सुनिश्चित करने के लिये कि ताजमहल हिंदू चित्र, संस्कृत शिलालेख, धार्मिक लेख, सिक्के तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं जैसे कौन कौन से साक्ष्य छुपे हुये हैं उसके के सातों मंजिलों को खोल कर उसकी साफ सफाई करने की नितांत आवश्यकता है।"

"69. अध्ययन से पता चलता है कि इन बंद कमरों के साथ ही साथ ताज के चौड़ी दीवारों के बीच में भी हिंदू चित्रों, मूर्तियों आदि छिपे हुये हैं। सन् 1959 से 1962 के अंतराल में श्री एस.आर. राव, जब वे आगरा पुरातत्व विभाग के सुपरिन्टेन्डेंट हुआ करते थे, का ध्यान ताजमहल के मध्यवर्तीय अष्टकोणीय कक्ष के दीवार में एक चौड़ी दरार पर गया। उस दरार का पूरी तरह से अध्ययन करने के लिये जब दीवार की एक परत उखाड़ी गई तो संगमरमर की दो या तीन प्रतिमाएँ वहाँ से निकल कर गिर पड़ीं। इस बात को खामोशी के साथ छुपा दिया गया और प्रतिमाओं को फिर से वहीं दफ़न कर दिया गया जहाँ शाहज़हां के आदेश से पहले दफ़न की गई थीं। इस बात की पुष्टि अनेक अन्य स्रोतों से हो चुकी है। जिन दिनों मैंने ताज के पूर्ववर्ती काल के विषय में खोजकार्य आरंभ किया उन्हीं दिनों मुझे इस बात की जानकारी मिली थी जो कि अब तक एक भूला बिसरा रहस्य बन कर रह गया है। ताज के मंदिर होने के प्रमाण में इससे अच्छा साक्ष्य और क्या हो सकता है? उन देव प्रतिमाओं को जो शाहज़हां के द्वारा ताज को हथियाये जाने से पहले उसमें प्रतिष्ठित थे ताज की दीवारें और चुनवाये हुये कमरे आज भी छुपाये हुये हैं। "

और हमारे देश का दुर्भाग्य ये की सरकार ने इस सारे रहस्यों की छानबीन करने की जगह सभी भेदों को दबाने का ही प्रयास किया ...........
ऐसा क्यों किया होगा ?? इसका कारण तो आप भी जानते हैं ............

निष्कर्ष :- तो यही निकलता हैं की ताजमहल के अंदर बहुत रहस्य दबे पदे हैं जिससे हिन्दू जनता को परिचित होना आवश्यक हैं ..............सरकार ने हिन्दू जनता को सिर्फ धोखे में रखा हुआ हैं आज तक ....................................................

अंत में :- सिर्फ ताज ही नहीं अपितु क़ुतुब मीनार ,जामा मस्जिद , लाल किला जैसे कई स्थापित्य हिन्दू राजाओ की इस भव्य भारत को देन हैं | इतिहास को तोड़ मरोड़ के पेश किया गया हैं , पर हमारा फर्ज हैं की जो भी सच जानने पढने को हमे मिलता हैं उसे हम ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुचाये और अपनी अगली पीढ़ी को हिन्दू होने गर्व वापिस दिलाये ||
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Monday, April 8, 2013

विडंबना.........!!!!!!!!!!!!.....25 वर्षों से नगरपालिका में धूल- धूसरित है शहीद खुशदेव की प्रतिमा....वधावन



 
9 अप्रैल को 26वें बलिदान दिवस पर विशेष
 25 वर्षों से नगरपालिका में धूल- धूसरित है शहीद खुशदेव की प्रतिमा
कुछ और ही बयां करती है दावों की जमीनी हकीकत
 सुरेंद्र पाल वधावन/ शाहाबाद मारकंडा
 यूं तो देश पर प्राण न्यौछावर करने वाले शहीदों को सम्मान देने के लिए सरकार एंव प्रशासन द्वारा बड़े-बड़े दावे किए जाते है लेकिन कभी कभी जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। परंतु 9 अप्रैल 1988 को शाहाबाद में आंतकवादियों से निहत्थे जूझते वीरगति को प्राप्त हुए शहीद खुशदेव सिंह एडवोकेट, शहीद गुरप्रीत कौर और शहीद गुरदीप सिंह के प्रति हरियाणा सरकार और प्रशासन का उपेक्षापूर्ण रवैया कुछ अलग ही तस्वीर पेश करता है। उल्लेखनीय है कि तत्कालीन भाकपा विधायक डा. हरनाम सिंह के निवास पर आंतकवादियों ने 9 अप्रैल 1988 को हमला किया था और उस रात्रि को याद कर आज भी शाहाबाद के लोगों के हृदय कांप उठते हैं जिसमें उनके निहत्थे बेटे खुशदेव ङ्क्षसह, पुत्रवधू गुरप्रीत कौर एवं उनके संबंधी गुरदीप सिंह ने अपनी जान पर खेलते हुए हथियारों से लैस आंतकवादियों का सामना करते हुए अपने पिता डा. हरनाम सिंह एवं अपनी माता श्रीमति जसंवत कौर की तो प्राण रक्षा की लेकिन स्वयं शहीद हो गए।  इस हमले में स्वंय विधायक, उनकी पत्नी जसवंत कौर और नजदीकी रिश्तेदार हीरा ङ्क्षसह भी गोलियां लगने पर गंभीर रुप से घायल हो गए थे। इस निर्मम घटना से पूरा नगर ही नही, अपितु पूरा देश कांप उठा था। 

तत्कालीन राष्टरपति आर. वैंकटरमनन ने इस परिवार के अदम्य साहस को देखते हुए देश में पहली बार एक ही परिवार के 5 सदस्यों को बहादुरी के लिए शौर्य चक्र देकर सम्मानित किया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री चौ. देवीलाल ने भी तुरंत शाहाबाद पहुंचकर शहीद खुशदेव सिंह की स्मृति में एक स्मारक बनाने और विधायक के निवास वाली गली का नाम गली शहीदां रखने की घोषणा की थी। उधर प्रशासन द्वारा बराडा-जी.टी.रोड चौंक पर शहीद खुशदेव सिंह के नाम पर एक पार्क बनाने तथा उसमें शहीद की प्रतिमा स्थापित करने की भी घोषणा की गई थी। तत्कालीन विधायक डा. हरनाम सिंह ने इस आतंकवादी हमला में अपना सुशिक्षित युवा बेटा खुशदेव सिंह व पुत्रवधू गुरप्रीत कौर खो दिए थे। उनकी धर्मपत्नी जसवंत कौर गंभीर रूप से घायल होने के कारण पी.जी.आई. में थी और वह तो अपने बेटे व पुत्रवधू के अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हो पाई थी। लेकिन डाक्टर हरनाम सिंह ने कहा था कि मेरे पुत्र व पुत्रवधु ने निॢभकता पूर्वक आतंकवाद से जूझते हुए राष्ट्रहित में अपनी जानें न्यौछावर की हैं। मुझे उन पर गर्व है। उनका जीवन सभी के लिए अनुकरणीय व प्रेरणादायक है। धन्य है ऐसे देशभक्त पिता जिन्होंने इतना कुछ खो देने के उपरांत भी न सिर्फ धैर्य रखा अपितु ऐसे उद्गार व्यक्त किए। 9 अप्रैल को इन्हीं तीन बहादुर शहीदों का 26वां बलिदान दिवस है।
तत्कालीन सरकार ने शहीदों की स्मृति में शेरशाहसूरी मार्ग पर शहीद खुशदेव सिह पार्क स्थापित करने व वहां शहीद खुशदेव सिंह की प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा की तथा 1,25,000 रुपए शहीद की प्रतिमा के लिए स्वीकृत कर नगरपालिका शाहाबाद को भेजे थे।  कितना दु:खदाई है कि घटना के 25 वर्ष उपरांत भी शहीद की प्रतिमा स्थापित नही हो सकी तथा जो प्रतिमा रोहतक के बुत निर्माता से बनवाई गई उससे शहीद का चेहरा मेल नही खाता। यह मूॢत नगरपालिका कार्यालय में पड़ी धूल चाट रही है। निकट भविष्य में यह बुत स्थापित होने के कोई आसार नजर नही आते। नगरपालिका निर्धारित स्थान पर यह बुत स्थापित करवा पाने में विफल रही है। नगरपालिका ने बुत निर्माता जिसने बुत निर्माण के 1 लाख 5 हजार रुपए लेने तय पाए थे के विरुद्ध क्या कार्रवाई की पालिका ही जानती है।
क्या कहते है डा. हरनाम सिंह ?
 जब इस बारे में पूर्व विधायक डा. हरनाम सिंह से बात की गई तो उन्होंने बताया कि इस घटना को 25 वर्ष पूरे हो गए हैं और इस बार शहीदी दिवस को बड़े स्तर पर खुशदेव सिंह स्मारक में मनाया जाएगा। उन्होंने बताया कि  इस अवसर पर विभिन्न शहरों से लोग इसमें शामिल होकर श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। उन्होंने कहा कि अब तो उस पार्क का वजूद ही खत्म हो गया है जिसमें प्रशासन ने मूर्तियां स्थापना की बात कही थी। उन्होंने कहा कि शहीद तो शहीद ही रहेगा लेकिन यदि उनकी याद में कोई स्मारक बनाया जाता है तो उससे आने वाली युवा पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी।
 नगरपालिका प्रधान के अनुसार खतम हो गई है वो जगह....
 जब इस बारे में नगरपालिका प्रधान सुदर्शन कक्कड़ से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि जिस स्थान पर इस मूर्तियां स्थापना का प्रस्ताव था वह अब सडक़ विस्तारीकरण के चलते खत्म हो गई है। उन्होंने कहा कि शहीदों के कारण ही हमने आजादी पाई है। उन्होंने कहा कि वह जल्द ही इस मामले की जांच करवाएंगे और शीघ्र ही बोर्ड की एक बैठक बुलाकर मूर्तियां स्थापना बारे चर्चा करेंगे।