Thursday, January 17, 2013

बेमिसाल था सरबंस बलिदानी गुरु गोबिंद सिंह जी का नीला घोड़ा

  बेमिसाल था सरबंस बलिदानी गुरु गोबिंद सिंह जी का नीला घोड़ा

श्रीगुरुद्वारा भट्ठा साहिब में आज भी सुरक्षित हैं नीले पंजो के निशान

श्री हुज़ूर साहिब नादेड़ में परवरिश पाते हैं घोड़े के वंशज

शाहाबाद मारकंडा -सुरेंद्र पाल वधावन-
सरबंस बलिदानी,उच्च के पीर,साहिब-ए-कमाल और खालसा पंथ के प्रवत्र्तक दशम पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह को नीले घोड़े वालिया के नाम से भी याद किया जाता है। 
यह इसलिए कि गुरुजी जिस घोड़े पर सवारी करते थे वह एक दुर्लभ प्रजाति का नीले रंग का घोड़ा था। मुगल हुक्मरानों के अत्याचारों से हिंदूओं क ी रक्षा के लिए गुरुजी ने खालसा पंथ की स्थापना की और अपने उपासकों को आदेश दिए कि चढ़ावे के रुप में शस्त्र व बढिय़ा किस्म के घोड़े लाया करें। गुरुजी को संभवत:किसी राजा या श्रद्वालु ने यह दुर्लभ घोड़ा उपहार स्वरूप दिया था। गुरुजी शस्त्र-शास्त्रों से पारंगत एक महान सूरमा ही नहीं थे बल्कि एक उच्चकोटि के कुशल घुड़सवार भी थे। गुरुजी ने धुड़सवारी का कौशल बचपन में ही अपने मामा कृपाल चंद से सीखा था। आकर्षक व्यक्तित्व के बेमिसाल योद्धा गुरुगोबिंद सिंह जब नीले घोड़े पर सवार हो कर निकलते लाखों में अलग ही दिखाई देते। गुरुजी सरीखे महान युगपुरुष की सवारी होने के कारण इस नीले घोड़े में भी दिव्यगुण आने लगे।
 पंजाब में श्रीआनंदपुर साहिब के निकट श्री भट्ठा साहिब नाम का एक गुरुद्वारा है जहां पर इस घोड़े के पदचिन्ह आज भी संभाल कर रखे हैं। इतिहास के मुताबिक यहां के ईंटो का भट्ठा था और गुरुजी ने यात्रा के दौरान यहां रुकने का मन बनाया। भट्ठे के मालिक ने मजाक में गुरुजी से कहा कि अगर वह रुकना चाहते हैं तो गर्म व तपे हुए भट्ठे के अंदर रात्रि विश्राम करलें। कहा जाता है कि तभी इस दिव्य नीले  घोड़े ने अपने अगले पंजे तपती मिट्टी पर उठा कर रख दिए और ऐसा करते ही भट्ठा एकदम ठंडा हो गया। कालांतर में यहां श्रीगुरुद्वारा भट्ठा साहिब का निर्माण किया गया। गुरु गोबिंद सिंह जी अपने जीवन के अंतिम दिनो में श्री नादेड़ साहिब में थे। यहां पर श्रीहजूर साहिब गुरुद्वारा निर्मित है। गुरुजी के इस नीले घोड़े के वंशज आज भी यहां ऐतिहासिक धरोहर के रुप में परवरिश पा रहे हैं और इन्हें खूब सजा कर गुरुपर्व और होला महल्ला के अवसर पर संगतों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। दिव्य घोड़े के इन वंशज घोड़े पर भी सवारी नहीं की जाती। होला महल्ला के अवसर पर यह घोड़ा अत्यंत उत्तेजित और क्रोधित रहता है और इसका शरीर पसीने से लथपथ रहता है। गुरुजी के  दिव्य नीले घोड़े के वंशजों का रंग कई पुश्तें बदलजाने के कारण अब फीका व मद्धम पड़ कर आसमानी रग का हो चुका है।
----सुरेंद्र पाल वधावन ,153 हूडा सेक्टर 1 शाहाबाद मारकंडा  जि़ला कुरुक्षेत्र 94168-72577

 


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