Tuesday, June 30, 2015

आखिर क्या है सरस्वती नदी का राज? Pawan Sonti

आखिर क्या है सरस्वती नदी का राज?
अरब सागर में या फिर बंगाल की खाड़ी में आखिर कहाँ मिलती है इसकी जल धारा?
कुरुक्षेत्र (पवन सोंटी)
सरस्वती नदी आदि काल से भारत के जनमानस की चेतना में बसती आई है| आस्था का केंद्र बिंदु रही यह नदी अपने आप में कई तरह के रह्श्य भी समेटे है| आज इस विषय पर चिंतन करने का कारन है केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती द्वारा दिया गया बयान| उनके अनुसार सरस्वती इलाहाबाद के संगम तट पर बहती थी| जबकि आश्चर्यजनक बात ये है की हरियाणा में शिवालिक पहाड़ियों की तलहट्टी में यमुनानगर जिला के आदि बदरी नामक स्थान पर सरस्वती के उद्गम स्थाल पर जो जानकारी लिखी है उसके अनुसार यह सरस्वती वैदिक सरस्वती है जोकि राजस्थान से होते हुए अरब सागर में जाकर मिलती है| रोचक बात ये है कि आदि काल से चली आ रही कथाओं के अनुसार सरस्वती इलाहाबाद में गंगा और यमुना के साथ संगम बनती है| इसको लेकर फिल्मों में गाने तक भी गाये गए| अब आम आदमी के लिए यह एक उलझन वाला सवाल है की आखिर क्या है इस सरस्वती का राज?


विकिपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार:-
उद्गम स्थल तथा विलुप्त होने के कारण
महाभारत में मिले वर्णन के अनुसार सरस्वती नदी हरियाणा में यमुनानगर से थोड़ा ऊपर और शिवालिक पहाड़ियों से थोड़ा सा नीचे आदिबद्री नामक स्थान से निकलती थी। आज भी लोग इस स्थान को तीर्थस्थल के रूप में मानते हैं और वहां जाते हैं। किन्तु आज आदिबद्री नामक स्थान से बहने वाली नदी बहुत दूर तक नहीं जाती एक पतली धारा की तरह जगह-जगह दिखाई देने वाली इस नदी को ही लोग सरस्वती कह देते हैं। वैदिक और महाभारत कालीन वर्णन के अनुसार इसी नदी के किनारे ब्रह्मावर्त था, कुरुक्षेत्र था, लेकिन आज वहां जलाशय हैं। जब नदी सूखती है तो जहां-जहां पानी गहरा होता है, वहां-वहां तालाब या झीलें रह जाती हैं और ये तालाब और झीलें अर्ध्दचन्द्राकार शक्ल में पायी जाती हैं। आज भी कुरुक्षेत्र में ब्रह्मसरोवर यापेहवा में इस प्रकार के अर्ध्दचन्द्राकार सरोवर देखने को मिलते हैं, लेकिन ये भी सूख गए हैं। लेकिन ये सरोवर प्रमाण हैं कि उस स्थान पर कभी कोई विशाल नदी बहती रही थी और उसके सूखने के बाद वहां विशाल झीलें बन गयीं। भारतीय पुरातत्व परिषद् के अनुसार सरस्वती का उद्गम उत्तरांचल में रूपण नाम के हिमनद (ग्लेशियर) से होता था। रूपण ग्लेशियर को अब सरस्वती ग्लेशियर भी कहा जाने लगा है। नैतवार में आकर यह हिमनद जल में परिवर्तित हो जाता था, फिर जलधार के रूप में आदिबद्री तक सरस्वती बहकर आती थी और आगे चली जाती थी।
वैज्ञानिक और भूगर्भीय खोजों से पता चला है कि किसी समय इस क्षेत्र में भीषण भूकम्प आए, जिसके कारण जमीन के नीचे के पहाड़ ऊपर उठ गए और सरस्वती नदी का जल पीछे की ओर चला गया। वैदिक काल में एक और नदी दृषद्वती का वर्णन भी आता हैं। यह सरस्वती नदी की सहायक नदी थी। यह भी हरियाणा से हो कर बहती थी। कालांतर में जब भीषण भूकम्प आए और हरियाणा तथा राजस्थान की धरती के नीचे पहाड़ ऊपर उठे, तो नदियों के बहाव की दिशा बदल गई। दृषद्वती नदी, जो सरस्वती नदी की सहायक नदी थी, उत्तर और पूर्व की ओर बहने लगी। इसी दृषद्वती को अब यमुना कहा जाता है, इसका इतिहास 4,000 वर्ष पूर्व माना जाता है। यमुना पहले चम्बल की सहायक नदी थी। बहुत बाद में यह इलाहाबाद में गंगा से जाकर मिली। यही वह काल था जब सरस्वती का जल भी यमुना में मिल गया। ऋग्वेद काल में सरस्वती समुद्र में गिरती थी। जैसा ऊपर भी कहा जा चुका है, प्रयाग में सरस्वती कभी नहीं पहुंची। भूचाल आने के कारण जब जमीन ऊपर उठी तो सरस्वती का पानी यमुना में गिर गया। इसलिए यमुना में यमुना के साथ सरस्वती का जल भी प्रवाहित होने लगा। सिर्फ इसीलिए प्रयाग में तीन नदियों का संगम माना गया जबकि भूगर्भीय यथार्थ में वहां तीन नदियों का संगम नहीं है। वहां केवल दो नदियां हैं। सरस्वती कभी भी इलाहाबाद तक नहीं पहुंची।

उमा भारती कहती हैं:- इसरो ने दिए संकेत, संगम पर बहती थी सरस्वती
 इलाहाबाद के संगम तट पर इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) ने सरस्वती नदी बहने के संकेत दिए हैं। केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा कायाकल्प मंत्री उमा भारती के मुताबिक राजस्थान और हरियाणा में इस बात के पहले ही साक्ष्य मिल चुके हैं। अब इलाहाबाद की बारी है। हालांकि इसके लिए अभी छह महीने का इंतजार करना पड़ेगा। अभी कुछ और साक्ष्यों की जरूरत है। इसके बाद ही इसकी आधिकारिक घोषणा की जाएगी। इलाहाबाद के सर्किट हाउस में नमामि गंगेप्रोजेक्ट का प्रेजेंटेशन देने आईं केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने संवाददाताओं को बताया कि इलाहाबाद में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम है। लंबे समय से इस सरस्वती नदी को खोजने का काम चल रहा था। वर्ष 2002 में इसके लिए प्रोजेक्ट सरस्वतीबना। ग्रांउड वाटर बोर्ड और इसरो इस दिशा में काम भी कर रहे हैं। संयोग से ग्रांउड वाटर बोर्ड का मंत्रालय मेरे ही पास है। मंत्री बनने के बाद मैने इस दिशा में सरस्वती नदी की खोज के काम में तेजी लाने को कहा। इस दौरान इसरो की मदद से इलाहाबाद किले में जो सरस्वती कूप है कि उसमें सरस्वती नदी की धारा की वास्तविकता जानने के लिए काम करने को कहा गया। इसरो ने इस बात के संकेत भी दिए हैं कि कूप में सरस्वती की धारा हो सकती है। अब स्पेस टेक्नोलॉजी की मदद से अगर जल की धारा मिल जाती है तो यह देखा जाएगा कि वह धरती के कितने नीचे है।

क्या सच में मिली सरस्वती की जलधारा?
 धरती के नीचे सरस्वती के बहने की कथा हम भी बचपन से सुनते आ रहे हैं, लेकिन इसके प्रमाण अभी पुख्ता नहीं हुए हैं| इसके बावजूद सरस्वती नदी की खुदाई के दौरान गत दिनों यमुनानगर जिला के गाँव मुगलवाली में जमीन के गर्भ में छुपा पानी क्या मिल गया कि हमने सरस्वती की जलधारा के मिलने का ढिंढोरा ही पीट डाला, ठीक उसी तरह जैसे कि गत वर्ष उत्तर प्रदेश में राजा का दबा खजाना मिलने का ढिंढोरा दुनिया में पिटा था और वहां खुदाई तक कर डाली गई थी| सरस्वती की खुदाई के दौरान पानी मिलने की घटना को कुछ ऐसे प्रचारित किया गया मानो जमीन से धार फूट पड़ी हो फूटी सरस्वती की जलधारा| जहाँ तक मेरे याद आता है की बिलासपुर- सढोरा के क्षेत्र में जमीन में कई जगह 7-8 फूट पर पहला जलस्तर आ जाता है जिसे हम ग्रामीण भाषा में चोवा कहते हैं| यह उतना ज्यादा तो नहीं होता की इससे नलकूप लगाकर खेतों की सिंचाई की जा सके, लेकिन खड्डा खोदने पर उसमे पानी एकत्रित हो जाता| मेरे याद है की करीब बीस साल पहले सढोरा के निकटवर्ती गाँव सरांवी में मेरे भांजे रंधीर सिंह ने खेत में समतल करते हुए जब ट्रैक्टर से 5-6 फूट तक मिटटी खींच डाली थी तो जमीन से पानी निकल आया था| यही कारन रहा है की इस क्षेत्र में नलकूप के कुंए कभी कामयाब नहीं रहे| पहले चोवे का पानी कुँए से रिस रिसकर उसमे भर जाता था जिस कारण नीचे मोटरें डूब जाती थी| जब सबमर्सिबल तकनीक नहीं आई थी तो लोग इस क्षेत्र में टर्बाइन से पानी निकालते थे| हालांकि मैं सरस्वती के मौजूदगी को नहीं नकार रहा, लेकिन मुझे लगता है की बहुकोणीय जांच होनी चाहिए| आखिर यह हिन्दुओं की आस्था से साथ देश की पौराणिक संसिकृति से जुडा मुद्दा है|  


Thursday, April 23, 2015

थानेसर व लाडवा पंचायत समितियों के वार्डो आरक्षण की सूची जारी, जिलापरिषद का ड्रा स्थगित


थानेसर पंचायत समिति में 8 व लाडवा में 4 वार्डो को अनुसूचित जाति के लिए किया आरक्षित, थानेसर में 30 और लाडवा में 16 वार्डो के आरक्षण के ड्रा निकाले

कुरुक्षेत्र 23 अप्रैल (पवन सोंटी)
 उपायुक्त सीजी रजिनिकांतन ने कहा कि पंचायत समिति थानेसर के वार्डों की वर्ष 2015 की अंतिम प्रकाशन सूची में वार्ड नं. 19, 8, 15, 21, 28, 30, 3, 17 में अनुसूचित जाति की जनसंख्या व प्रतिशतता सर्वाधिक है। इसलिए इन वार्डों को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किया गया है। इसी प्रकार लाडवा में वार्ड नम्बर 7, 6, 8 व 15 को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किया हैं।
उपायुक्त ने कहा कि वीरवार को थानेसर व लाडवा पंचायत समिति के वार्डो का आरक्षण कार्य एसडीएम थानेसर सतबीर कुंडू की देखरेख में किया गया। उन्होंने बताया कि अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए आरक्षण की प्रक्रिया प्रारंभ की गई। वार्ड न. 3 वर्ष  2010 के पंचायत आम चुनाव में महिला के लिए आरक्षित रह चुका है। इसी प्रकार वार्ड न. 8 वर्ष 2000 व 2010 के पंचायत आम चुनाव में महिला के लिए आरक्षित रह चुका है। इसी प्रकार वार्ड न. 17 वर्ष 2000 से 2010 में अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित रह चुका है, वार्ड न. 19 वर्ष 2010 में अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित रह चुका है। इसी प्रकार वार्ड न. 21 वर्ष 2000 व 2010 में महिला के लिए, वार्ड न. 15 वर्ष 1994 में महिला के लिए, वार्ड न. 30 वर्ष 2000 व 2005 में महिला के लिए आरक्षित रह चुका है। वार्ड न. 28 किसी भी आम चुनाव में महिला के लिए आरक्षित नहीं रहा गया। इसलिए वार्ड न. 28 को रोटेशन के तहत अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित किया गया है। अत: आरक्षण के प्रावधानों को मध्यनजर रखते हुए वार्ड न. 3, 8, 15, 17, 19, 21 व 30 का ड्रा किया गया, जिसमें से वार्ड न. 15 व वार्ड न. 30 को अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित किया गया है।
उन्होंने बताया कि पिछड़े वर्ग के आरक्षण के लिए पंचायत समिति थानेसर के लिए एक स्थान का प्रावधान है। पंचायत समिति थानेसर के वार्डों की वर्ष 2015 की अंतिम प्रकाशन सूची में वार्ड न. 25 में पिछड़े वर्ग की सर्वाधित जनसंख्या है। अत: वार्ड न. 25 पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित किया गया है। उपरोक्त प्रक्रिया सम्पन्न करने उपरांत पंचायत समिति थानेसर के वार्ड न. 1, 2, 4, 5, 6, 7, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 16, 18, 20, 22, 23, 24, 26, 27 व 29 शेष रह जाते हैं, जोकि अनारक्षित हैं। उपरोक्त वार्डों में से 7 स्थान महिला के लिए आरक्षित किये जाने हैं। मौके पर बताया गया कि वार्ड न. 20, 23 व 26 जो वर्ष 1994 से लेकर वर्ष 2010 तक सम्पन्न हुए। पंचायत आम चुनाव में महिलाओं के लिए कभी भी आरक्षित नहीं रहे हैं। वित्तायुक्त एवं प्रधान सचिव हरियाणा सरकार विकास एवं पचंायत विभाग द्वारा जारी पत्र क्रमांक ईसीए-1-2014/71599-71619 दिनांक 20.11.2014 में आरक्षण पंचायत समिति के बारे में दिए गए प्रावधानों के अनुसार पहले इन वार्डों को महिला के लिए आरक्षित किया गया है। अत: इन वार्डों को छोडक़र शेष बचे वार्ड न. 1, 2, 4, 5, 6, 7, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 16, 18, 22, 24, 27 व 29 में से महिलाओं के स्थान आरक्षण के लिए ड्रा निकाला गया। ड्रा आफ लॉट की प्रक्रिया प्रारंभ की गई तथा ड्रा आफ लॉट के फलस्वरूप वार्ड न. 2, 5, 14 व 16 महिला के आरक्षित किए गये हैं।
एसडीएम  थानेसर सतबीर कुंडू ने बताया कि पंचायत समिति लाडवा के वार्डों की वर्ष 2015 की अंतिम प्रकाशन सूची में वार्ड न. 7, 6, 8, 15 में अनुसूचित जाति की जनसंख्या व प्रतिशतता सर्वाधित है। अत: उक्त वार्डों को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किया गया है। तदोपरांत उपरोक्त वर्णित वार्डों में से अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए आरक्षण की प्रक्रिया प्रारंभ की गई। उन्होंने बताया कि वार्ड न. 7 वर्ष 2010 के पंचायत आम चुनाव में अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित रह चुका है। इसी प्रकार वार्ड न. 6 वर्ष 2000 व 2005 के पचंायत आम चुनाव में अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित रह चुका है। इसी प्रकार वार्ड न. 8 वर्ष 2010 में अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित रह चुका है व वार्ड न. 15 वर्ष 2010 में सामान्य महिला के लिए आरक्षित हो चुका है। अत: आरक्षण के प्रावधानों को मध्यनजर रखते हुए वार्ड न. 6, 7, 8 व 15 का ड्रा किया गया, जिसमें से वार्ड न. 7 व वार्ड न. 8 को अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित किया गया है।
उन्होंने बताया कि पिछड़े वर्ग के आरक्षण के लिए पंचायत समिति लाडवा के लिए एक स्थान का प्रावधान है। पंचायत समिति लाडवा के वार्डों की वर्ष 2015 की अंतिम प्रकाशन सूची में वार्ड न. 10 में पिछड़े वर्ग की सर्वाधिक जनसंख्या है। अत: वार्ड न. 10 पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित किया गया है। उपरोक्त प्रक्रिया सम्पन्न करने उपरांत पंचायत समिति लाडवा के वार्ड न. 1, 2, 3, 4, 5 , 9, 11, 12, 13, 14 व 16 शेष रह जाते हैं जो कि अनारक्षित हैं। उन्होंने बताया कि उपरोक्त वार्डों में से 4 स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित किए जाने हैं। मौके पर बताया गया कि वार्ड न. 1, 2 व 16 जो वर्ष  1995 से लेकर वर्ष 2010 तक सम्पन्न हुए, पंचायत आम चुनाव में महिलाओं के लिए कभी भी आरक्षित नहीं रहे हैं। वित्तायुक्त एवं प्रधान सचिव हरियाणा सरकार विकास एवं पंचायत विभाग द्वारा जारी पत्र क्रमांक इसीए-1-2014/71599-71619 दिनांक 20.11.2014 में आरक्षण पंचायत समिति के बारे में दिए गए प्रावधानों के अनुसार पहले इन वार्डों को महिला के लिए आरक्षित किया जाता है। अत: इन वार्डों को छोडक़र शेष बचे वार्ड न. 3, 4, 5, 9, 11, 12, 13 व 14 में से महिलाओं के स्थान आरक्षण के लिए ड्रा निकाला गया। ड्रा आफ लॉट की प्रक्रिया प्रारंभ की गई तथा ड्रा आफ लॉट के फलस्वरूप वार्ड न. 5 महिला के आरक्षित किए जाते हैं।

Friday, April 17, 2015

इस्लाम में 'चार बीवियों' की चतुराई --शीबा असलम फहमी



हाल में ही दारुल उलूम देवबंद ने एक महत्वपूर्ण फतवा दिया है। दारुल उलूम देवबंद ने 13 अप्रैल को दिये गये अपने फतवे में कहा है कि इस्लाम हालांकि एक पत्नी के रहते दूसरी शादी की इजाजत देता है लेकिन मुसलमान ऐसा न करें। दारुल उलूम का कहना है कि भले ही शरीयत हमें ऐसी इजाजत देता है लेकिन भारतीय परंपरा में यह मान्य नहीं हो सकता कि एक पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी कर ली जाए। ऐसा करने पर दोनों पत्नियों के साथ अन्याय होगा। तो क्या इस्लाम सच में एक से अधिक बीबियों को रखने की इजाजत देता है?
इस्लाम के बारे में बहुत सारे मौलानाओं का मत है कि इस्लाम चार बीवियों की इजाज़त देता है। लेकिन हकीकत यह है कि इस्लाम में कहीं से भी चार बीबीयों की इजाजत नहीं है। भारतीय मौलानाओं ने बहुत ही कुटिलपूर्ण तरीके से यह भ्रम फैला रखा है कि इस्लाम में चार बीबीयों की इजाजत है। जो लोग यह तर्क देते हैं कि इस्लाम में चार बीबीयों को रखने की इजाजत है वे समझ लें कि इस्लाम में कहीं भी चार बीवियों का पति होने की इजाजत नहीं है।
साहेबान (मुसलमान हजऱात जऱा ग़ौर फऱमाएँ) इस्लाम में चार बीवियों की इजाज़त नहीं है ! युद्ध आदि उपरान्त के आपातकाल में, यतीमों की देखभाल के लिये, कुछ ख़ास शर्तों के साथ इस्लाम में चार बीवियों तक की इजाज़त है, और यह एक पाबन्दी या रोक है उस समाज पर जो कितनी भी औरतों को हरम में रखा करता था। और यह अरब भूमि के केवल एक शहर मदीना के लिए उहुद युद्ध की हार के बाद, विशेष परिस्थिति में लाया गया विशेष-प्रावधान है, जिसे कुरआन में कभी भी, सभी मुसलमानों के लिए, जायज़ या वांछनीय घोषित नहीं किया गया। और इस विशेष एहकाम को भी चार की गिनती पर रोका गया।
उहुद प्रसंग ये है की मदीना शहर जो की इस्लाम में विश्वास ला चुका था, के मुसलमानों की जंग मक्कावासियों से उहुद नामक घाटी में हुई, इस जंग में मदीनावासियों की हार हुई और 700 मर्दों की जनसँख्या घटकर केवल 400 रह गयी, इस परिस्थिति में यतीमों (शहीदों की बेवा और बच्चे) की ज़िम्मेदारी को समाज पर डालने के लिये इस एक प्रावधान को लाया गया की शहीदों के बच्चे अपनी माओं से अलग हुए बिना सहारा पाएं और उन्हें क़ानूनी सरपरस्ती भी मिले। इस आपातकालीन प्रावधान में भी शर्त थी की जो मुसलमान मर्द एक से अधिक बीवी करे वो एक तो इतना समर्थ हो की सबकी देखभाल कर सके, दूसरे वो सभी पत्नियों को एक सामान समझे, और भेदभाव न करे। लेकिन इसी के साथ कुरआन में साफ़ कहा गया है की यह किसी मर्द के लिये मुमकिन नहीं की वह चारों को बराबर का चाहे, इसलिए तुम्हें आदेश यही है की एक ही करो। स्वयं मुहम्मद साहब ने भी कहा है की ये मुमकिन नहीं की शौहर पत्नियों के बीच भेदभाव ना करे। खुद अपने लिए उन्होंने दुआएं मांगी की उनसे किसी (पत्नी) के प्रति पक्षपात ना हो जाये। इसके बावजूद वे खुद मानते हैं कि उनकी आखरी पत्नी हजऱत आयशा ही उनकी सबसे प्रिय पत्नी थीं।
सभ्य, शिक्षित और जागरूक समाजों ने इस मामले में एक साफ़ और ठोस फैसला लेने में अपने धर्म ग्रंथो, पंडित-पादरियों और परंपरा आदि कि रुकावटों को ठोकर से उड़ा दिया। ख़ुद मुसलमानों ने भी अपने फ़ायदे के आगे, वक़्त की ज़रुरत के हिसाब से बैंकिंग, शेयर बाज़ार, आदि से लाभ कमाने को नई व्याख्या द्वारा जायज़ घोषित कर दिया। यही नहीं महकमाती ज़रुरत को देखते हुए जानदार मखलूक (इंसान की भी) कि फोटो उतारना, सफऱ में चुस्त कपड़ों में, ना-महरम और बे-पर्दा नाजऩीनो से ख़िदमत लेना, मोबाइल से एस एम् एस के ज़रिये बीवी को तलाक दे कर चम्पत हो जाना, फ़ोन पर निकाह करना, शादी से पहले होनेवाली बीवी की खूबसूरती की पड़ताल करना, बे-शर्मी से मेहेर हज़म कर जाना, भारतीय उपमहाद्वीप में तो दहेज़ मांगना, ज़ात-पात, ऊंच-नीच जैसी सभी आधुनिक रीतियाँ-कुरीतियाँ डंके की चोट पर अपना ली हैं। लेकिन देश/ दुनिया के कानून के मुताबिक़ एक पत्नी प्रथा को इस्लाम के नाम पर लगातार धता बता रहा है। इस गंभीर अराजकता पर ख़ुद मुसलमान औरतों को समझ और हिम्मत पैदा करना ज़रूरी है क्योंकी वे इस्लाम के नाम पर सरासर बेवक़ूफ़ बनाई जा रही हैं। इस्लाम एक से ज़्याद: बीवी की इजाज़त देता ही नहीं। आपातकाल के दौरान हर समाज अपने नियम कुछ ना कुछ ढीले करता ही है, लेकिन हालात सामान्य होते ही उन विशेष प्रावधानों को ज़ब्त कर लिया जाता है, ये सारी दुनिया का नियम है। इसी के साथ ये भी जानना ज़रूरी है कि कुरआन कहीं पर भी मर्दों को शारीरिक सुख के लिये एक से अधिक पत्नी की इजाज़त नहीं देता। अब सवाल ये उठता है की मुसलमान आलिम क्या कुरआन को सही पढ़ नहीं पाते, या फिर शारीरिक हवस के आगे मजबूर हो कर कुरआन को झुट्लाते रहे हैं? सारी दुनिया में अमीर और अय्याश मुसलमान इस्लाम के नाम पर एक से ज़्याद: शादियाँ, बिना किसी नैतिक, सामाजिक, क़ानूनी और धार्मिक दबाव के कर रहा है। हालाँकि ऐसा करने की आर्थिक स्थिति अधिसंख्य की नहीं है, लेकिन फिर भी कुल मिला कर आए दिन कि ऐसी ख़बरों ने माहौल ऐसा ही पैदा किया है कि अमीर, औसत और गऱीब, किसी भी दर्जे का मुसलमान एक पत्नी के जीते जी उसकी सौत लाने में हिचकिचाता नहीं। वो बड़े आराम से कह देता है कि हमारे यहाँ तो इसकी इजाज़त है। यही नहीं, वो इस ग़लत काम को सुन्नत भी कह डालता है, क्यूंकि मुहम्मद साहब ने एक से अधिक शादियाँ कि थीं। सउदी अरब के पेट्रो-दौलती शेख़ जिस बेशर्मी से अपने हरम सजाए हैं, और 20-25 तक औलादें पैदा कर रहे हैं उसका असर एशिया-अफ्ऱीका की जाहिल, गऱीब और क़बीलाई मानसिकता पर साफ़ देखा जा सकता है। हद ये है की ये जाहिल लोग यूरोप, अमरीका और कनाडा आदि मुल्कों में मज़दूरी करने जाते हैं तो वहां भी अब ये क़ानूनी मांग करने लगे हैं की उनका कल्चर और धार्मिक परंपरा का पालन करते हुए उन्हें एक से अधिक पत्नी की इजाज़त मिले। संख्याबल के बढऩे के साथ इनके हौसले भी बढ़ रहे हैं। इस सब में सबसे मक्कारीपूर्ण है मुसलमानों की मज़हबी कय़ादत का सहयोग ! मुस्लिम समाज को जाहिल, गऱीब और सभ्यता से बैर रखनेवाली इस परंपरा से वफादारी करने वाला बना कर वे अपनी आधी आबादी को निस्सहाय और अपमानित कर रहे हैं। माना की 95त्न मुसलमान मर्द एक ही शादी करता है लेकिन इस अपराध को मान्यता देकर सौत की तलवार को तो लटकाए रखा ही गया है। कोई ताज्जुब नहीं की मौलानाओ को पढ़ी-लिखी, आत्म-निर्भर, सत्ता में भागीदार मुस्लिम महिला कितनी खटकती है। जब भारत के इन्साफ पसंद हल्क़े दलित-आदिवास महिलाओं के साथ मुसलमान महिलाओं को भी संसद में आरक्षण की बात कर रहे थे तो ये ख़ुद-परस्त कठमुल्ले इस साज़िश के लिये इकठ्ठा हुए की हमारी औरतें तो संसद में जाएंगी नहीं क्यूंकि वह सत्ता में सिर्फ़ इस्लामी मुल्क में ही शामिल हो सकती हैं। कोई इनसे पूछे की जहाँ सत्ता में अपनी बात बताने के लिये सबसे ज़्यादा भागीदारी की ज़रुरत है वहीँ वे इसे रोक कर उनके प्रतिनिधित्व को कैसे पूरा करेंगे? 62 बरसों में इन कठमुल्लों ने बे-ईमान, मेहेर-ख़ोर, धोकेबाज़ी से दूसरी शादी करने और बात-बे-बात तलाक की तलवार चलानेवाले शौहरों की नकेल कसने के लिये कोई मुहिम नहीं चलाई, अब जब लगा की ख़ुद मुसलमान औरत संसद में बैठकर कहीं क़ानून और क़ायदे की बात ना करने लगे तो लगे इस्लाम-इस्लाम करने। इनसे पूछा जाना चाहिए की भाई अभी तक तो आपको इसी जम्हूरियत से ही सभी कुछ चाहिए था।
आरक्षण से लेकर इंसाफ़ तक! तो फिर इस मामले में जम्हूरियत में ऐब क्यूँ निकल आया? अगर ये इस आशंका से पीडि़त हैं की इलेक्शन-विलेक्शन में हमारी औरतों को ग़ैर मर्दों के बीच जाना पड़ेगा जहाँ वे सुरक्षित नहीं, तो इसमें कोई बड़ा मसला नहीं, हमारी औरतों का हमारे मर्द साथ दें। लेकिन सवाल यह है कि आंकड़े बताते हैं कि हिन्दू हो या मुसलमान या सिख या इसाई, औरतों की इज्ज़त पर हाथ तो ज़्यादातर अपने ही डालते हैं। दूसरे ये कि मुस्लिम देशों में जो बलात्कार होते हैं वे क्या इम्पोर्टेड बलात्कारियों द्वारा किये जाते हैं? मुसलमान मर्द ना हुआ फ़रिश्ता हो गया और वो भी एक ऐसा फ़रिश्ता जिसे एक तरफ तो चार-चार औरतों कि महती आवश्यकता पड़ रही है अपनी कामुकता को साधने के लिये दूसरी तरफ़ उसी की हिफ़ाज़त में औरत सुरक्षित है। इसका मतलब सामने से तो यही निकल रहा है कि हम हमारी औरतों के साथ कुछ भी करें, दूसरा ना करे बस यही देखना है। इस मामले में हिन्दू मर्द भी उतने ही बड़े जियाले हैं। उनका ध्यान भी बस इस तरफ़ है कि हमारी लड़कियों को कोई शाहरुख़ खान, आमिर खान, ज़हीर खान, इमरान खान आदि बेवक़ूफ़ ना बना पाएं, वे ख़ुद चाहें तंदूर काण्ड करें या घासलेट काण्ड, मट्टू काण्ड करें या खैरलांजी। लेकिन बेचारे हिन्दू मर्दों के पास इस्लाम को बचाने जैसे बहाने नहीं हैं (बजरंगियों, हिन्दू-वाहिनियों आदि को छोडक़र) इसलिए उन्हें भारतीय संस्कृति कि बेपनाह फि़क्र सताए रहती है। ख़ैर, सवाल ये है की क्या इस्लाम इतना मासूम मज़हब है कि अपनी आधी आबादी को हर समय ग़ुलाम की हैसियत में रखने का इन्तिज़ाम कर के भी वह उनसे एकनिष्ठ समर्पण की उम्मीद कर सकता है? तब, जबकि वह औरत को शिक्षा, रोजग़ार, संपत्ति और कय़ादत से ख़ारिज नहीं करता? कोई भी इंसान शिक्षित, आत्म-निर्भरता, संपत्ति का स्वामी और सत्ता में भागीदार होकर भी तीन सौतों को क्यूँ झेलेगा? ज़ाहिर है पढ़ी लिखी, आत्मनिर्भर, स्वयं-सिद्ध मुसलामन औरतें ये लोग पैदा ही नहीं होने देना चाहते। इस्लाम में- परदे के नाम पर शिक्षा पर रोक, बाल-विवाह को जारी रखने के लिये शारदा एक्ट से परहेज़, निकाह और तलाक के पंजीकरण से परहेज़ जिससे धूर्त पति की नाक में नकेल ना कसी जा सके, चार बीवियों को कुदरती मर्दानी यौन-ज़रुरत बताना और सत्ता में भागीदारी को इस्लाम विरूद्ध बता कर एक महिला विरुद्ध महाद्जाल बुना गया है की एक तरफ से निकले तो दूसरे पायदान पर अटक जाए। मौलाना हजऱात की इन खुली धांधलियों में इस्लाम धर्म की फज़़ीहत तो एक साइड-इफ़ेक्ट है, डाईरेक्ट-इफ़ेक्ट जो इंसानों की ज़िन्दिगी पर पड़ता है उसकी गंभीरता को समझना ज़्यादा ज़रूरी है। मौलानाओं की इन्ही हरकतों की वजह से मुसलमानों में शिक्षा का विकास नहीं हो पा रहा है। आज मुसलमान विश्व के स्तर पर कोई योगदान देने की बात तो दूर, ख़ुद अपने घर-परिवार, ख़ानदान-समाज के मसलों पर भी सही सोच नहीं पैदा कर पा रहा। और मर्द-औरत के रिश्तों में बिगाड़, तनाव, तलाक और हिंसा बढ़ी है। दूसरे मामलों में भी तर्क का नहीं तालिबानीकरण का सहारा लेने का चलन बढ़ रहा है।
इस्लाम में चार शादियों की ‘इजाज़त’ की धांधली उस ही बड़ी साज़िश का हिस्सा है जो मौलाना अशरफ़ अली थानवी मार्का व्यभिचार को धर्म के अंधे विश्वासों से जायज़ ठैराती है। लेकिन यदि किसी कूढ़-मघज़ को अब भी यह अपराध इस्लाम के नाम पर करना है तो इस्लाम की सही व्याख्या करने से परहेज़ नहीं, ना ही इस्लाम के इतर देश के क़ानून को सर्वोपरि मानने से। आखिर सवाल आधी आबादी के आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास का है। ऐसी शादियों में पैदा होनेवाली औलादों के मानसिक संतुलन और स्वास्थ्य का है, एक कमाने और ज़्यादा खानेवालों की उपस्थिति से पैदा हुई गऱीबी, अशिक्षा और अवसाद का है। इस दुनिया के अभावों-अपमानों से निजात के तौर पर, ‘उस दुनिया’ के ऐश और सम्मान की उम्मीद पर खुदकश होने को तैयार नौनिहालों की इस दुनिया में वापसी का है। इसलिए इन अहम् मसलों को मुल्लाओं पर छोडऩा खतरनाक होगा, अक़ल से काम लीजिये, साफ़ और ठोस एक्दाम के ज़रिये समाज को कबीलाई मानसिकता से उबारिये। वरना जिस ‘युद्ध जैसे आपातकाल’ के लिए चार-शादी की ना-पसंद वयवस्था करनी पड़ी थी वो पूरी इंसानियत का स्थाइकाल बन जाएगा। तालिबानों की व्यवस्था इस ओर क़दम बढ़ा ही चुकी है। लगातार युद्ध के आपातकाल में जीना मुसलमान की नियति कब तक बना रहेगा?
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जिला परिषद के वार्डों की आरक्षण प्रक्रिया 23 अप्रैल को


कुरुक्षेत्र 17 अप्रैल |
 उपायुक्त सीजी रजिनिकांतन ने कहा कि हरियाणा पंचायती राज चुनाव नियमावली 1994 के अनुसार जिला कुरुक्षेत्र की पंचायत समितियों के वार्डों की सूची तथा जिला परिषद के वार्डों की सूची का अंतिम प्रकाशन 16 अप्रैल को किया जा चुका है। अब वार्डों के आरक्षण का कार्य 23 अप्रैल को सुबह 11 बजे उपायुक्त कार्यालय के सभा कक्ष में किया जाएगा। 
उन्होंने आज यहां जारी एक नोटिस में कहा है कि पंचायत चुनाव के नोटिस एवं प्रारंभिक प्रकाशन 26 मार्च 2015 द्वारा हरियाणा पंचायती राज चुनाव नियम के तहत जिला में स्थित जिला परिषद व पंचायत समितियों थानेसर, पिहोवा, लाडवा, शाहाबाद, बाबैन व इस्माईलाबाद के वार्डों की सूची का प्रारंभिक प्रकाशन 26 मार्च को किया गया था। अब उपरोक्त तिथि को प्रारंभिक प्रकाशन किए गए पंचायत समितियों के वार्डों की सूची बारे एसडीएम थानेसर, पिहोवा, शाहाबाद व एडीसी कुरुक्षेत्र द्वारा निर्धारित समयावधि के दौरान एतराजों तथा अपीलों का निपटान करने के उपरांत रिपोर्ट को सम्प्रेषित किया गया है। नियमानुसार पंचायत समितियों के वार्डों की सूची तथा जिला परिषद के वार्डों की सूची का अंतिम प्रकाशन 14 अप्रैल को किया जा चुका है। आमजन के अवलोकन के लिए इसकी एक प्रति नोटिस बोर्ड पर भी चस्पा दी गई है।
उन्होंने बताया कि पंचायती राज चुनाव नियमावली के अनुसार जिला परिषद कुरुक्षेत्र के वार्डों में से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जाति महिला, सामान्य श्रेणी व सामान्य श्रेणी की महिलाओं तथा पिछड़ी जाति के लिए वार्ड आरक्षित करने के लिए 23 अप्रैल 2015 को प्रात: 11 बजे सभाकक्ष उपायुक्त कार्यालय में लॉट का कार्य किया जाएगा।