Monday, June 12, 2017

रिटायरमेंट से पहले ही फरार हुए जस्टिस कर्णन

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज) : जस्टिस सीएस कर्णन सोमवार रिटायर हो रहे हैं, मगर वह अब भी फरार हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट के जज कर्णन 9 मई से भूमिगत हैं। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन को अवमानना का दोषी मानते हुए 6 महीने की सजा सुनाई थी। यह पहला मौका है, जब कोई जज अपनी फेयरवेल में शामिल नहीं होगा, अगर वह सामने भी आते हैं तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा.
जस्टिस कर्णन ने मद्रास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों की बेंच ने इस सिलसिले में जस्टिस कर्णन की लिखी चि_ियों का स्वत संज्ञान लेते हुए उनके खिलाफ कोर्ट की अवमानना का मुकदमा शुरू किया था। इस सिलसिले में जस्टिस कर्णन 31 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए थे। ऐसा करने वाले वह किसी हाई कोर्ट के पहले जज थे। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन को अवमानना के मामले में दोषी करार देते हुए 6 महीने की सजा सुनाई थी। कोर्ट के इस आदेश के बाद ही जस्टिस कर्णन कोलकाता से अपने गृह प्रदेश तमिलनाडु आ गए थे। उनके पीछे अगले ही दिन पश्चिम बंगाल पुलिस की दो टीमें भी चेन्नई पहुंच गईं थी। तब से अब तक तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कई ठिकानों में जाकर तलाश कर चुकी है, लेकिन जस्टिस कर्णन का कोई पता नहीं चल पाया है। 
हालांकि जस्टिस कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को असंवैधानिक बताया था। उन्होंने कहा था, 8 फरवरी से ये सात जज मुझे कोई भी न्यायिक और प्रशासनिक कार्य नहीं करने दे रहे हैं। इन लोगों ने मुझे परेशान कर दिया है और मेरा सामान्य जीवन खराब कर दिया है. इसलिए, मैं सभी सात न्यायाधीशों से मुआवजे के रूप में 14 करोड़ रुपये लूंगा।

Thursday, May 4, 2017

जारी है जजों की जंग: जस्टिस कर्णन ने SC के आदेश को बताया 'पागलपन'

मेडिकल टेस्ट से जस्टिस कर्णन का इनकार, SC के आदेश को बताया 'पागलपन'

उत्तम हिन्दू से साभार: 
कोलकाता (उत्तम हिन्दू न्यूज) : सुप्रीम कोर्ट की अवमानना मामले में आरोपी कलकत्ता हाईकोर्ट के जज जस्टिस सीएस कर्णन ने गुरुवार को मेडिकल टेस्ट से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच के आदेश पर तीन सदस्यों की एक मेडिकल टीम सुबह न्यू टाउन एरिया स्थित जस्टिस कर्णन के घर पहुंची थी। इस दौरान कर्णन ने टीम को कहा कि वह पूरी तरह से ठीक हैं और उन्हें मेंटल टेस्ट की आवश्यकता नहीं है। 

मेडिकल टीम के पहुंचने से पहले जस्टिस कर्णन ने एक प्रेस ब्रिफिंग बुलाई। उन्होंने मेडिकल जांच को इलीगल बताते हुए कहा, कानून के अनुसार इस तरह की जांच में गार्जियन का सिग्नेचर जरूरी है. यह प्रक्रिया नहीं फॉलो की गई। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को 'पागल न्यायाधीशों का पागलपन भरा आदेश' करार देते हुए जांच कराने से इनकार किया है। मेरी लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ है और मैं इसे जारी रखूंगा।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगदीश सिंह केहर की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय पीठ ने सोमवार को न्यायमूर्ति कर्णन के मानसिक स्वास्थ्य की जांच के लिए 4 मई को एक मेडिकल बोर्ड के गठन का निर्देश दिया था और 8 मई को जांच रिपोर्ट सौंपने को कहा था। न्यायमूर्ति कर्णन ने अपने मानसिक स्वास्थ्य की जांच संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को 'हास्यास्पद' करार दिया था। न्यायमूर्ति कर्णन न्यायपालिका के अपमान और सर्वोच्च न्यायालय के कई न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर अवमानना का सामना कर रहे हैं।

Wednesday, May 3, 2017

जजों के बीच जारी है जंग, एक दूसरे के खिलाफ जारी कर रहे हैं वारंट

जस्टिस कर्णन ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सहित सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों के खिलाफ जारी किया गैर-जमानती वारंट 

आखिर उस देश का क्या होगा, जहां के जज ही आपस में झगड़ने लगे हो! भारत में सर्वोच न्यायालय व कलकत्ता उच्च न्यायालय के जजों के कानूनी झगड़े ने तो न्यायपालिका को ही मज़ाक बना कर रख दिया है।
इस मामले में कोर्ट की कार्यवाही में अवमानना का सामना कर रहे कलकत्ता हाई कोर्ट के जज जस्टिस सी एस कर्णन ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस जे एस खेहर सहित सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया है।

हाई कोर्ट में जाने से प्रतिबंधित चल रहे कर्णन ने कोलकाता के अपने घर से ही सुओ-मोटो न्यायिक आदेश जारी कर दिया। आदेश देते समय जस्टिस कर्णन ने कहा कि, 'यह आम जनता को भ्रष्टाचार और अस्थिरता से बचाने के लिए देश के हित में है।' उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार को जस्टिस खेहर सहित 7 जजों के खिलाफ गैर जमानती वॉरंट जारी करने का निर्देश दिया। उन्होंने दिल्ली के डीजीपी या पुलिस कमिश्नर को इस आदेश का पालन करने का आदेश दिया।

उन्होंने CJI खेहर के अलावा जस्टिस दीपक मिश्र, जस्टिस चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर, जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष, जस्टिस कुरियन जोसेफ के खिलाफ यह गैर जमानती वॉरंट जारी किया। कर्णन ने इन सभी जजों को उनके समक्ष पेश होने को कहा था। मंगलवार को दिए आदेश में उन्होंने कहा कि ये सभी 'आरोपी' जज 'अनुपस्थित' रहे।

जस्टिस कर्णन का यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों के द्वारा उनका मेडिकल परीक्षण कराए जाने के एक दिन बाद आया। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आदेश दिया था कि जस्टिस कर्णन की दिमागी जांच के लिए मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाए। हालांकि इसके बाद कर्णन ने भी सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों को AIIMS के मानसिक रोग से जुड़े बोर्ड के सामने पेश करने का आदेश दे दिया था।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस कर्णन पर अवमानना मामले में सुनवाई चल रही थी। जस्टिस कर्णन ने 20 जजों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ अवमानना का मामला दर्ज किया था।

'आप' के अंदर फिलहाल थमा बवाल, लेकिन पिक्चर अभी बाकी है- NBT

'आप' के अंदर फिलहाल थमा बवाल, लेकिन पिक्चर अभी बाकी है

नवभारतटाइम्स.कॉम, नई दिल्ली
आम आदमी पार्टी ( आप) में पिछले तीन-चार दिनों से उठा बवंडर भले थमता हुआ दिख रहा है, लेकिन यह पूरी तरह से शांत नहीं हुआ है। पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) की बैठक में मौजूद सूत्र ने बताया कि दो दिनों से बागी तेवर दिखा रहे कुमार विश्वास की मांगों के आगे जिस तरह से पार्टी ने घुटने टेके हैं उससे साफ हो गया है कि अरविंद केजरीवाल अब पार्टी में पहले की तरह 'अजेय' नहीं रह गए हैं। सूत्र का कहना था कि यह पार्टी के अंदर केजरीवाल के समानांतर एक और सत्ता केंद्र की शुरुआत है।


गौरतलब है कि दिल्ली में हाल में संपन्न नगर निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी की हार के बाद से ही पार्टी में अंदरखाने नेतृत्व पर सवाल उठाए जाने लगे थे। गुटों में बंटी आप के नेता एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी करते नजर आए। इसी क्रम में पार्टी के ओखला से विधायक अमानतुल्लाह खान ने कुमार विश्वास के खिलाफ खुलकर बयानबाजी करते हुए उन पर बीजेपी के साथ मिलकर पार्टी को तोड़ने की कोशिश करने आरोप लगाया था। इसके बाद कुमार विश्वास अमानतुल्लाह को पार्टी से निकालने की मांग पर अड़ गए थे।

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"यदि अंधकार से लड़ने का संकल्प कोई कर लेता है
तो एक अकेला जुगनू भी सब अन्धकार हर लेता है"🇮🇳
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आभार! भारत माता की जय!
2:33 PM - 3 May 2017
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जब इशारों-इशारों में पार्टी आलाकमान ने संकेत दे दिया कि अमानतुल्लाह पर पीएसी से निकालने से ज्यादा कड़ी कार्रवाई नहीं की जाएगी तो कुमार विश्वास ने मंगलवार शाम पांच बजे अपना ब्रह्मास्त्र चल दिया और सार्वजनिक रूप से कह दिया कि वह पार्टी छोड़ने के बारे में रात तक घोषणा कर सकते हैं।

इसके बाद देर रात तक कुमार विश्वास को मनाने का दौर चलता रहा। रात 11 बजे खुद सीएम अरविंद केजरीवाल और डेप्युटी सीएम मनीष सिसोदिया गाजियाबाद के वसुंधरा में कुमार विश्वास के घर उन्हें मनाने पहुंचे। इस दौरान वहां काफी कार्यकर्ता थे और उन्होंने जमकर विश्वास के समर्थन में नारेबाजी की। सुबह पीएसी की मीटिंग शुरू होने से पहले भी कुमार विश्वास ने अपने तेवर बरकरार रखते हुए कहा कि वह अपने 'राष्ट्रवादी विडियो' वी द नेशन के लिए माफी नहीं मांगेगे भले ही संगठन, पार्टी, सरकार व व्यवस्था नाराज रहे। साफ ही उन्होंने यह भी साफ कर दिया था कि वह पार्टी में मजबूत आंतरिक लोकतंत्र और जिन सदस्यों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत है उनके खिलाफ कार्रवाई के पक्षधर हैं।


जिस तरह से पीएसी की बैठक में कुमार विश्वास की ज्यादातर बातें मान ली गई हैं उससे उनका पलड़ा भारी दिख भी रहा है। अमानतुल्लाह को पार्टी से सस्पेंड कर दिया गया है और उन्हें मनीष सिसोदिया की जगह राजस्थान का प्रभारी बना दिया गया। सूत्र का कहना है कि अरविंद और उनके करीबियों के नेतृत्व में लगातार हार झेल रही आप मौजूदा स्थिति में विश्वास के सवालों की अनदेखी करने की स्थिति में नहीं है। सूत्र ने बताया कि पार्टी नेतृत्व को इसलिए भी झुकना पड़ा क्योंकि ज्यादातर विधायक और मंत्री भी विश्वास के सवालों के साथ खड़े दिख रहे हैं। अमानतुल्लाह के अलावा केवल मनीष सिसोदिया ही एक ऐसे नेता हैं, जिन्होंने विश्वास के खिलाफ खुलकर कुछ बोला है।

पार्टी के सूत्र का कहना है कि जिस तरह से सारे फैसले तीन-चार लोगों का गुट ले रहा है, उसको लेकर भारी असंतोष है और उसे कुमार विश्वास ने आवाज दी है। उनका यह भी कहना है कि पार्टी का झगड़ा खत्म नहीं है बल्कि आने वाले दिनों में आप के भीतर एक और सत्ता केंद्र देखने को मिल सकता है। या फिर यह भी हो सकता है कि आप में एक टूट दिखे।

Monday, May 23, 2016

दुनिया के कई देशों में यह आम प्रथा है, खासकर मुस्लिमबहुल देशों में. इसलिए जब ताजिकिस्तान ने इस पर रोक लगाने का फैसला लिया तो दुनिया का चौंकना स्वाभाविक था.

http://satyagrah.scroll.in/  से साभार........

 
दुनिया के कई देशों में यह आम प्रथा है, खासकर मुस्लिम बहुल देशों में. इसलिए जब ताजिकिस्तान ने इस पर रोक लगाने का फैसला लिया तो दुनिया का चौंकना स्वाभाविक था.
चीन, अफगानिस्तान, किर्गिस्तान और उज्बेकिस्तान के बीचों-बीच बसा ताजिकिस्तान मध्य एशिया का सबसे गरीब देश है. ऐसा दुर्लभ ही होता है कि इस देश की कोई घटना सारी दुनिया में चर्चा का विषय बन जाए. लेकिन बीती 13 जनवरी को यहां की संसद का एक फैसला अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियों में शामिल हुआ. यह फैसला था देश में कॉन्सेंग्युनियस विवाह (रक्त संबंधियों से विवाह) पर प्रतिबंध लगाना. दुनिया के कई देशों, विशेषकर मुस्लिम बहुल देशों में कॉन्सेंग्युनियस विवाह बहुत ही आम प्रथा है. इसीलिए जब मुस्लिम बहुल ताजिकिस्तान ने इस प्रथा पर रोक लगाने का प्रगतिशील फैसला लिया तो इसने दुनिया भर के कई लोगों को हैरत में डाल दिया.
ताजिकिस्तान ने यह फैसला लेते हुए माना है कि कॉन्सेंग्युनियस विवाह से पैदा होने वाले बच्चों में आनुवंशिक रोग होने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं. यहां के स्वास्थ्य विभाग ने 25 हजार से ज्यादा विकलांग बच्चों का पंजीकरण और उनका अध्ययन करने के बाद बताया है कि इनमें से लगभग 35 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो कॉन्सेंग्युनियस विवाह से पैदा हुए हैं. कॉन्सेंग्युनियस विवाह से पैदा होने वाले बच्चों में आनुवंशिक रोग होने की संभावनाओं पर लंबे समय से चर्चा होती रही है. लेकिन यह चर्चा कभी भी इतने व्यापक स्तर पर नहीं हुई कि इस तरह के विवाहों पर प्रतिबंध लग सके.
ताजिकिस्तान ने यह फैसला लेते हुए माना है कि कॉन्सेंग्युनियस विवाह से पैदा होने वाले बच्चों में आनुवंशिक रोग होने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं.
दुनिया के लगभग एक-चौथाई हिस्से में आज भी कॉन्सेंग्युनियस विवाह आम हैं. इनमें एशिया, उत्तरी अफ्रीका, स्विट्ज़रलैंड, मध्यपूर्व, और चीन, जापान और भारत के कई हिस्से शामिल हैं. इन सभी जगहों पर कॉन्सेंग्युनियस विवाह के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं. मुख्यतः कॉन्सेंग्युनियस विवाह उसे कहा जाता है जब कोई व्यक्ति अपने चचेरे/ममेरे भाई/बहन या उससे भी निकट रक्तसंबंधी से शादी करे. दक्षिण भारत में कई जगह लड़कियों की उनके मामा से शादी होना भी कॉन्सेंग्युनियस विवाह का एक उदाहरण है.
कई देश ऐसे भी हैं जहां कॉन्सेंग्युनियस विवाह पर पूरी तरह प्रतिबंध तो नहीं है लेकिन, यह आंशिक रूप से प्रतिबंधित है. उदाहरण के लिए कई अमरीकी राज्यों में कॉन्सेंग्युनियस विवाह की अनुमति सिर्फ उन्हीं लोगों को दी जाती है जिनकी उम्र 65 वर्ष से अधिक हो या जो बच्चे पैदा करने में असमर्थ हों. इसी तरह कुछ देश ऐसे भी हैं जहां सिर्फ चिकित्सकीय जांच के बाद ही कॉन्सेंग्युनियस विवाह की अनुमति दी जाती है. जानकारों का मानना है कि इन सभी देशों में इस तरह के प्रतिबंध सिर्फ इसीलिए लगाए गए हैं ताकि बच्चों में होने वाले आनुवंशिक रोगों को रोका जा सके.
ब्रिटेन में पैदा होने वाले बच्चों में पाकिस्तानी मूल के कुल तीन प्रतिशत बच्चे होते हैं. लेकिन आनुवंशिक रोग के पीड़ित ब्रिटेन के कुल बच्चों में से 13 प्रतिशत पाकिस्तानी मूल के ही हैं.
ऐसे कई अध्ययन हुए हैं जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि आम बच्चों के मुकाबले कॉन्सेंग्युनियस विवाह से होने वाली संतानों में आनुवंशिक रोग होने की संभावनाएं कई गुना ज्यादा होती हैं. कुछ समय पहले ही ब्रिटेन के ब्रैडफोर्ड में भी ऐसा एक अध्ययन किया गया था. ब्रैडफोर्ड में पाकिस्तानी मूल के लोगों का बड़ा रिहाइशी इलाका है. यहां की कुल आबादी में लगभग 17 प्रतिशत आबादी पाकिस्तानी मुस्लिम लोगों की है. इन लोगों में से 75 प्रतिशत लोग अपने ही समुदाय में चचेरे/ममेरे भाई/बहनों से शादियां करते हैं. अध्ययन में सामने आया था कि यहां रहने वाले बच्चों में से कई आनुवंशिक रोगों का शिकार हैं और इसका मुख्य कारण कॉन्सेंग्युनियस विवाह ही है. एक अन्य अध्ययन के अनुसार ब्रिटेन में पैदा होने वाले बच्चों में पाकिस्तानी मूल के कुल तीन प्रतिशत बच्चे होते हैं. लेकिन आनुवंशिक रोग के पीड़ित ब्रिटेन के कुल बच्चों में से 13 प्रतिशत पाकिस्तानी मूल के ही हैं.
दक्षिण भारत के कई इलाकों में भी कॉन्सेंग्युनियस विवाह का चलन है. यहां भी यह इस प्रथा के चलते बच्चों में कई तरह के रोग देखे जा सकते हैं. आंध्र प्रदेश की रहने वाली बिंदु शॉ इस विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय से रिसर्च कर रही हैं. वे बताती हैं कि भारत में अब तक ऐसे शोध न के बराबर ही हुए हैं जिनमें कॉन्सेंग्युनियस विवाह और उनके कारण होने वाले आनुवंशिक रोगों को साथ में परखा गया हो. कॉन्सेंग्युनियस विवाह के सामाजिक पहलुओं और आनुवंशिक रोगों के चिकित्सकीय पहलुओं पर अलग-अलग तो कई शोध हो चुके हैं लेकिन इन पर साथ में शोध करने वाली बिंदु शायद पहली भारतीय ही हैं.
'मैंने दो सौ ऐसे परिवारों पर अध्ययन किया है जिन्होंने कॉन्सेंग्युनियस विवाह किया था. इनमें से 97 परिवारों के बच्चे आनुवंशिक रोग से पीड़ित थे.'
बिंदु बताती हैं, 'मैंने दो सौ ऐसे परिवारों पर अध्ययन किया है जिन्होंने कॉन्सेंग्युनियस विवाह किया था. इनमें से 97 परिवारों के बच्चे आनुवंशिक रोग से पीड़ित थे. यह भी देखने में आया है कि चचेरे/ममेरे भाई/बहनों से हुई शादी की तुलना में मामा से शादी होने पर बच्चों में इस तरह के विकारों की संभावनाएं ज्यादा होती हैं.' वे आगे बताती हैं, 'जब भी कोई व्यक्ति अपने रक्तसंबंधियों से शादी करता है तो उनके कई जीन एक समान होते हैं. इस स्थिति में यदि उनके जीन में कोई विकार होता है तो उनके होने वाले बच्चे में ऐसे विकृत जीन की दो प्रतियां पहुंच जाती हैं. यही रोग का कारण बनता है. जबकि समुदाय से बाहर शादी होने पर जीन का दायरा बढ़ जाता है और इसलिए किसी विकृत जीन के बच्चों तक पहुंचने की संभावनाएं काफी कम हो जाती हैं.'
रिसर्च के लिए यह विषय चुनने के बारे में बिंदु बताती हैं, 'मैं जब स्कूल में पढ़ती थी तब से ही इस विषय में मेरी रुचि रही है. हमारे समाज में यह प्रथा आम है और मेरे कई रिश्तेदार इसके चलते आनुवंशिक रोगों का शिकार हुए हैं. इसलिए मैं हमेशा से इस विषय पर रिसर्च करना चाहती थी.' कॉन्सेंग्युनियस विवाह के कई दुष्परिणामों को जानने के बाद भी क्या यह प्रथा सिर्फ धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के चलते ही जारी है? इस सवाल के जवाब में बिंदु कहती हैं, 'मुझे लगता है कि धार्मिक मान्यताओं से ज्यादा सामाजिक पहलुओं के चलते लोग आज भी कॉन्सेंग्युनियस विवाह करते हैं. लोग मानते हैं कि अपने ही संबंधियों से शादी होने पर संपत्ति बाहर नहीं जाएगी और उसका बंटवारा नहीं होगा. इसके साथ ही लड़कियों के माता-पिता अपनी बेटी किसी अजनबी को सौंपने से बेहतर अपने किसी रिश्तेदार को सौंपना ही समझते हैं. विशेष तौर से ग्रामीण इलाकों में इस तरह की शादियों को ही ज्यादा वरीयता दी जाती है.'
कॉन्सेंग्युनियस विवाह को सही ठहराने वाले अक्सर यह तर्क देते हैं कि ऐसे विवाहों से होने वाले बच्चों में आनुवंशिक रोग की संभावनाओं को बढ़ा-चढ़ा कर दर्शाया जाता है.
कॉन्सेंग्युनियस विवाह जिन समुदायों में प्रचलित है उनमें कई बार प्रेम संबंधों के चलते भी इस तरह के विवाह होते हैं. बिंदु बताती हैं, 'बच्चे बहुत छोटी उम्र से ही अपने चचेरे/ममेरे भाई-बहनों से मिलते हैं, उनके साथ खेलते हैं और साथ ही बड़े होते हैं. ऐसे में उनकी आपसी दोस्ती बहुत अच्छी होती है और जब उन्हें इस संभावना का पता होता है कि उनकी शादी हो सकती है तो यह दोस्ती प्रेम संबंधों में भी बदल जाती है.' इन तमाम पहलुओं के अलावा धार्मिक मान्यताओं को भी कई लोग कॉन्सेंग्युनियस विवाह का एक मुख्य कारण मानते हैं.
कॉन्सेंग्युनियस विवाह को सही ठहराने वाले अक्सर यह तर्क देते हैं कि ऐसे विवाहों से होने वाले बच्चों में आनुवंशिक रोग की संभावनाओं को बढ़ा-चढ़ा कर दर्शाया जाता है. ताजिकिस्तान में लिए गए हालिया फैसले का विरोध करने वाले भी यही मांग कर रहे हैं कि इस तथ्य की पुष्टि के लिए ज्यदा आंकड़े प्रस्तुत किये जाएं कि कॉन्सेंग्युनियस विवाह ही आनुवंशिक रोगों का बड़ा कारण है. इन लोगों का तर्क है कि कॉन्सेंग्युनियस विवाह से होने वाले बच्चों के बीमार होने की उतनी ही संभावनाएं होती हैं जितनी किसी 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिला के माँ बनने पर उसके बच्चे के बीमार होने की होती हैं. ताजिकिस्तान संसद के फैसले का विरोध करते हुए यह लोग सवाल कर रहे हैं कि जब किसी 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिला को मां बनने से नहीं रोका जाता तो फिर कॉन्सेंग्युनियस विवाह करने वालों पर रोक क्यों लगाई जानी चाहिए?
लेकिन चिकित्सा विज्ञान को समझने वाले जानकार मानते हैं कि कॉन्सेंग्युनियस विवाह को धार्मिक या सांस्कृतिक नज़रिए से नहीं बल्कि चिकित्सकीय नज़रिए से परखा जाना जरूरी है और इस लिहाज़ से ताजिकिस्तान के इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए.

Wednesday, May 11, 2016

कर्ज ने निगली 3 जिंदगियाँ।

पंजाब के किसानों का दर्द!
पवन सोंटी (11मई) 
पंजाब में गत दिनों एक क्षेत्र के ही 3 किसानों ने आर्थिक तंगी के चलते मौत को गले लगा लिया। पंजाबी समाचार पत्र डेली प्रहरी की रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के विधानसभा हल्का गीदड़बाहा के गाँव हूसनर के 6 लाख रुपए के कर्ज मे डूबे युवा किसान खुशपाल सिंह ने 8 मई को नहर मे छ्लांग लगाकर आत्मह्त्या कर ली। रिपोर्ट के अनुसार उसके बीमार पिता के साथ 3 बहनों की जिम्मेवारी इस युवा किसान के सिर पर थी। उसकी सेम की समस्या से  3 एकड़ जमीन घाटे के अलावा कुछ नही उगल रही थी।
उधर भटिंडा जिला के गाँव कोरेमाना के 1 एकड़ के किसान अमर दास ने ढाई लाख के कर्ज के चलते अपने खेत मे जा कर फांसी का फंदा लगाकर जीवन लीला समाप्त कर ली। वह ठेके-बंटाई पर खेती करता था, लेकिन पिछले दिनों उसकी कपास की फसल को सफ़ेद मक्खी ने नष्ट कर दिया था, जिसका मुआवजा तक उसे अभी नहीं मिला था।
एक अन्य दुखद घटना में भटिंडा जिला के ही गाँव चनराथल के खेत मजदूर मंदर सिंह ने आर्थिक तंगी के चलते अपने घर में ही कीटनाशक दवाई पी कर जान दे दी। उसकी गरीबी देखिये की उसके घर में अंतिम संस्कार के लिए लक्कड़ भी नहीं थी,  आस पड़ोस के लोगों ने ही उसके अंतिम संस्कार का जुगाड़ किया।
इन तीनों घटनाओं में किसानों की आर्थिक तंगी उनकी मौत का कारण बनी है। इसके साथ ही ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि ये छोटी जोत के (सीमांत अथवा भूमिहीन किसान) थे।  
समाचार पत्रों की रिपोर्टों के अनुसार पंजाब में प्रतिदिन 4 किसानों की मौत का आंकड़ा है जो कि आर्थिक तंगी में जीवन दे रहे हैं। अकेले कोट धरमु में 35 किसान आर्थिक तंगी में जान दे चुके हैं।