Tuesday, July 23, 2013

प्रो. अमर्त्य सेन आज ख़बरों में हैं. ...Saurabh Arya


  • मोदी पर रखे गए अपने विचारों के लिए प्रो. अमर्त्य सेन आज ख़बरों में हैं. मीडिया एक बार फिर निराश कर रहा है. कल प्रो. अमर्त्य सेन अपना व्‍याख्‍यान दे रहे थे...मैं वहीं मौजूद था. कल रात प्रो. सेन ने देश की विकास कथा, अन्‍य दक्षिण-एशियाई देशों से तुलना, चीन-सिंगापुर-दक्षिण कोरिया जैसे देशों की तरक्‍की के कारणों, भारत में शिक्षा और जन-स्‍वास्‍थ्‍य की लचर स्थिति और इन क्षेत्रों में आजादी के बाद कम निवेश के चलते देश के पिछड़ने के बारे में बहुत सी महत्‍वपूर्ण बातें कहीं. पर जब रात 11 बजे घर लौट कर टीवी ऑन किया तो ब्रेकिंग न्‍यूज थी कि ' प्रधानमंत्री के तौर पर अमर्त्य सेन को मोदी पसंद नहीं'. गोया सेन ही प्रधानमंत्री को चुनेंगे. मीडिया के विवेक पर कोई आश्चर्य नहीं था कि पूरे व्‍याख्‍यान में से उन्‍हें मोदी ही काम की चीज नज़र आए. प्रो. सेन एनडीटीवी की बरखा दत्‍त द्वारा उनके मुंह में डाले जा रहे शब्‍दों को लेकर शुरू से ही सतर्क थे और एक दो बार तो उन्‍होंने इस अनावश्‍यक माउथ फीडिंग के लिए बरखा की मुस्‍कुराते हुए खिचाई भी की. मेरी समझ से बाहर था कि एक अर्थशास्‍त्री से मोदी पर सवाल क्‍यों पूछे जाते हैं. प्रो. सेन के साथ मौजूद अर्थशास्‍त्री जीन ड्रेज ने उन्‍हें ऐसे सवालों का जवाब देने से टोका भी.....पर प्रो. सेन ने खुले दिल से अपने मन के विचार रख ही दिए. फिर भी, अपनी बातों को तार्किक ढंग से रखते हुए प्रो. सेन ने मोदी पर अपने बेहद संतुलित विचार रखे....उन्‍होंने गुजरात की तरक्‍की से सबक लेने की बात कई बार कहीं. खासकर वहां फिजिकल इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर के क्षेत्र में हुई तरक्‍की से. परंतु उन्‍होंने यह भी कहा कि वह उस राजनीति को पसंद नहीं करते हैं जो मोदी गुजरात मे करते हैं....जिसमें अल्‍पसंख्‍यक राज्‍य से भयभीत हों आदि आदि और वे ऐसे व्‍यक्ति को प्रधानमंत्री के रूप मं नहीं देखना चाहते वहां वह एक ऐसे व्‍यक्ति को देखना चाहेंगे तो सभी को साथ लेकर चले. कल उस अविस्‍मरणीय व्‍याख्‍यान के बाद शायद उन मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए थी जिन पर हमारा और व्‍यवस्‍था का ध्‍यान नहीं है....देश के विकास के क्रम में कुछ कमजोर कडि़यों को तलाशता यह व्‍याख्‍यान अद्भुत था....पर मीडिया की कलंदरबाजी में देश यह सब जानने से वंचित रह जाएगा. Photo Credit : Priyanka Dey



    • Vivek Shrivastava बरखा ने अपने मालिकों के लिए अच्छा ही काम किया
    • Umesh Tiwari यथा द्रष्टि,तथा स्रष्टि
    • Ashutosh Mishra लेकिन अमर्त्य सेन को भी बताना चाहिए कि अलपसंख्यकों के मन में गलत भय व्याप्त है.. अगर ऐसी बात होती तो गुजरात में अल्पसंख्यक रहते ही नहीं वहां से भाग खड़े होते तीन बार जनता ने मोदी को चुना इसका मतलब वहां की जनता चाहती है कि अल्पसंख्यक भयभीत रहें... अमर्त्य सेन भी अपने वामपंथी होने का हक तो अदा करेंगे ही... भारत के अर्थव्यवस्था की इतनी चिंता थी तो मनमोहन को कुछ सुझाव देते.. घोटालों और भ्रष्टाचार पर भी बोलते... बरखा तो कांग्रेसी है ही लेकिन क्या अमर्त्य सेन केवल उसके द्वारा पूछे गए प्रश्न का जबाव देने के लिए बाध्य थे...
    • Ajit Harshe सौरभ आपने बिल्कुल सही लिखा है। जैसा प्रचार मोदी विरोधी उनका करते हैं कई बार लगता है कि वे उनके समर्थक ही हैं ...
    • Ashutosh Mishra सौरभ जी आपके कमेंट दिखाई नहीं दे रहे हैं...
    • Saurabh Arya Ashutosh Mishra आशुतोष जी, प्रो. सेन ने मोदी पर जो विचार रखे वे उनके नितांत निजी विचार हैं...एक आम देशवासी की तरह उन्‍हें भी किसी मुद्दे पर अपनी राय कायम करने का हक है. वे एक अर्थशास्‍त्री हैं और अर्थशास्त्र पर उनके विचार हमारे लिए ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण हैं. भ्रष्‍टाचार पर भी इन दोनों अर्थशास्त्रियों के विचार जानने योग्‍य हैं. कृपया इनकी हालिया पुस्‍तक पढें और जीन ड्रेज के विचार जानें. आप संतुष्‍ट होंगे
    • Ashutosh Mishra इनकी एक किताब Argumentative Indian पहले पढ़ी थी सबकुछ तो ठीक था लेकिन जब भारत के परमाणु कार्यक्रम के विरोध में लिखते हुए पीके संगमा के ससंद में दिए गए भाषण जिसमें वे पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम और उसके वैज्ञानिकों की प्रतिभा(चोरी) का समर्थन करते हैं,तो विचित्र लगता है.. परमाणु हथियार का विरोध तो जायज है लेकिन इतने खिलाफ हो गए कि अपने ही देश का विरोध करने लगें.. अटल जी नें आमंत्रित किया था इन्होंने मना कर दिया था .... क्या कहा जाए...
    • Deepak Bindal yaar ye Barkha Dutt ne BJP se kitna paisa khaya hai pehle ye pata karo...Neera Radia kaand me bhi iska naam aaya tha...aur desh ki moorkh janta bhool gayi thi. these big names in Media are just big fakes & liars....they are killing genuine पत्रकारिता.
      Aur rahi baat modi ki...to main bhi Professor Sen ki baat se sehmat hoon.
    • Ashutosh Mishra किताब तो पढ़ना ही है... लेकिन जैसे इन्होंने अपने नितांत निजी विचार देश की जनता के सामने रखे वैसे ही नितांत निजी विचार दोनों सरदार(मंटोक और मनमोहन) की अर्थव्यवस्था पर भी रखते उनके नाकारे पन पर भी कुछ बोलते... अम्र्त्य सेन उन कुछ गिने चुनें लोगों में हैं जिन्होंने अपने देश का मान बढ़ाया है.. पूर्वाग्रही होने से बचना चाहिए या देश की राजनीति पर खुल कर बोलते या बरखा से कहते कि जो भी प्रधानमंत्री बने उसे देश के लिए यह करना चाहिए... लेकिन अब मेरी बात अमर्त्य सेन जी सुनते कैसे...
    • Jitendra Narayan ऊंची-ऊंची बातें भारतीय मीडिया के समझ से ही बाहर है..
    • Ashutosh Mishra मीडिया में दलालों का बोलबाला है कुछ बहुत बड़े वाले सरकार में शामिल हो गए हैं.... बरखा जानती थी कि अमर्त्य सेन साहब का जबाव क्या होगा इसलिए पूछा, देश की अर्थव्यवस्था की बजाय उसे अपने अर्थ की भी तो चिंता करनी थी...
    • Saurabh Arya Ashutosh Mishra आशुतोष जी मेरी बात को अन्‍यथा न लीजिएगा...परंतु क्‍या वास्‍तव में आपने कल का व्‍याख्‍यान सुना था. यह मैं इसलिए पूछ रहा हूं क्‍योंकि कल का व्‍याख्‍यान ही देश के विकास क्रम में सरकारी स्‍तर पर हुई खामियों को उजागर करता था...वे कमजोर कडियां जिन्‍हें अगर वक्‍त रहते मजबूत किया जाता तो शायद देश की तस्‍वीर कुछ और ही होती. प्रो. सेन ने सारी पंचवर्षीय योजनाओं की प्राथमिकताओं की भी खबर ली थी और उस राव-मनमोहन मॉडल की भी जिससे आज 'सब सहारा क्षेत्र में आइलैंड आफ कैलिफोर्निया बन गए हैं' हमे वास्‍तव में पूर्वाग्रहों से दूर रहना चाहिए. हां अपने दूसरे कमेंट में आपने एकदम सही कहा...बरखा जानती थी कि जवाब क्‍या होगा....और उसके कार्यक्रम के लिए एकदम परफैक्‍ट मसाला मिल जाएगा
    • Ashutosh Mishra #AmartyaSen husband of Rothschild (Nobel Society)" and #Nobel laureate and Bharat Ratna wrote in 2006:

      "Only Christian schools "are perfectly acceptable" but other faith schools "are a big mistake and should be scrapped if the Government wants to encourage a unifying British identity.".
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      Now, has Amartya Sen ever opposed her Vatican master #SoniaGandhi establishing separate University for Muslims from tax payers money of Hindus, or scholarship in schools based on religion?

      He is a known #Communist (Marxists), who happens to be a self-proclaimed Atheist and known Hindu baiter, with a hate mongering attitude towards Indian culture and philosophy, more on the likes of Britishers views of Indian.

      Not surprisingly, having all the ingredients, he is been promoted to English speaking Indian intellectual circus in Indian Media and serving well for his Western Masters.
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      Issue 2 : Former Indian President Shri APJ Abdul Kalam wrote letter to SM Krishna slamming Amartya Sen for forcing him out of his brainchild pet project of Hindu-Buddhist philosophy based Nalanda university in Bihar.

      Link 1 : http://governancenow.com/news/regular-story/kalam-s-letter-damning-amartya-sen-out-public

      Link 2 : http://newindianexpress.com/thesundaystandard/article583100.ece
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      BTW, Amartya Sen is a nephew of Congress Minister Late Ashoke Kumar Sen.
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      Subramanian Swamy


      governancenow.com
      Former president APJ Abdul Kalam’s last July letter to foreign minister SM Krish...See More
    • Ashutosh Mishra नहीं अभी पढ़ रहा था ऊपर का लिंक देखें...
    • Vivek Shrivastava sir he is a renowned economist but still a human being .....The way modi have been criticized i feel pity for him and people of Gujrat ....if they are of a firm belief he has committed some wrong he could have been prosecuted....a man has done some thing good on ground you can not scrape his good doings .....whatever media and congress is doing can not be said to be democratic
    • Ashutosh Mishra ये भी एक तरीका है विरोध को समर्थन में बदलने का... मनमोहन सिंह क्या कम अच्छा भाषण देते हैं या अर्थवयवस्था को कम समझते हैं..... लेकिन कर क्या रहे हैं...और सेन तो सीधे सलाह दे सकते हैं... लेकिन देंगे नहीं ...
    • Lalit Pant सवाल एक और भी है कि सेन ने गुजरात के अल्पसंख्यकों पर जो विचार बनाए हैं वो मिडिया के प्रभाव से बने हैं या सेन साहब स्वंय भी गुजरात के अल्पसंख्यकों के बीच जाते रहें हैं ?
    • Saurabh Arya मेरा इस अनुभव को लिखने का आग्रह मात्र इतना है कि हम सेन साहब के मोदी पर विचारों को अनावश्‍यक तूल न दें....उन्‍होंने देश के विकास के लिए जो सूत्र दिए हैं उन पर चर्चा की जाए. अक्‍सर राजनीति के विवादों में मुद्दे गुम हो जाते हैं.
    • Ashutosh Mishra यही तो सबसे खराब बात है... देश के विकास के लिए जो जरूरी है उसपर चर्चा करने की बजाय मीडिया कोई और रंग दे देती है... मोदी ने भी विकास के अपने विचार बताए थे लेकिन वह छोड़ कर मीडिया तीन दिनों तक एक ही रट लगाए रही.. अगर देश के वर्तमान हालात पर चर्चा होती तो यूपीए की फजीहत होती जो कि सरकार नहीं चाहती और मीडिया तो उसी पर चर्चा करेगी जिससे लोगों का ध्यान वास्तविक मुद्दों से हट सके...
    • Rajkumar Jangra Jab tak log budhhu bakse (t.v ) se chipke rahege tab tak desh ke vikash ki jarurat nahi h

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